Sunday, October 30, 2011

सूखे चुम्बन और दो कश


हम उस मनहूस वक़्त में रहते थे,जहाँ सपने नहीं देखे जा सकते थे | क्योंकी ऐसा कहा जाता है की सपने देखने के लिए आँखें बंद करना पड़ती है और हम चाह कर भी अपनी आँखें बंद नहीं कर सकते थे| क्योंकि हमारी पलके उनसे निकलने वाले काले आंसुओं में बह गयी थी | हर बितते हुए पल के साथ यथार्थ हमारी छाती में खंजर बनकर गढ़ता जाता था |  उससे बचने के लिए हम मीठे सपने देखना चाहते थे और इस तरह हम खुली आँख ही सपना देखने लग गए | जब हम खेतों में उगी हुई सुखी जमीन पर चलते थे तो हमारी एडियों की दरारों में जमीने धँस जाती थी | चूँकि हमे खुली आँख ही सपने देखने की आदत पढ़ गयी थी इसलिए हमें लगता था की हम स्वर्ग में मखमलों पर चल रहे हैं | मखमल जो हमें इतने मुलायम लगते थे की हम उन्ही पर लेट जाना चाहते थे | क्योंकी इतनी कोमलता हमारी बीवियों की सुखी हुई चमड़ियों में नहीं बची थी | हम हमारी बीवियों से प्यार करना चाहते थे पर उनके होंठ पत्तों की तरह सुख गए थे | ऐसे पत्तें जिनमे तंबाकु भर दिए जाने के बाद हम उनसे कम से कम दो कश खींच सकते थे जो दो चुम्बन की तरह ही सुखद होते और वो भी अपनी अश्लीलता खोये बगैर |
जब हम सूखे हुए पेड़ों को देखते थे तो उन्हें बाहों में भरकर चुमते थे | क्योंकि वो स्वप्न में हमें स्वर्ग की अप्सराएँ लगती थी |हम उनके पेरों में पगड़ियाँ रखकर सुख की भीख माँगते थे |
हम रोते हुए पत्थरों पर नंगे होकर कूद जाते थे | क्योंकी हमें स्वप्न में लगता था की यहाँ अब भी नदी बह रही होगी पर अफ़सोस की हमारी चमड़ियों के टुकड़े हमारे शरीरों से टूट कर पत्थरों पर चिपक जाते थे  | और हम अपनी आँखें बंद कर लेते थे | हमारे गाल शर्म के मारे लाल हो जाते थे |क्योंकी हमें लगता था की हम अब नंगे हो गए हैं |
ठण्ड से बचने के लिए हम अपना सर मिट्टी के चूल्हों में धँसा लेते थे तो वहां पड़ी राख में हमें अब भी गर्माहट का अनुभव होता और दो चुटकी नमक (आटे में) डालकर बनायीं गयी गर्म रोटियों की खुश्बू का भी |
हम सब उस राख को खाने के लिए लड़ते थे लड़ना अब हमें प्यार करने जितना ही अच्छा लगने लग गया था | किसीको जान से मार देना हमें सच्चे प्यार करने जितना ही सुखद दिखता था | हमारे बच्चें हमारी बगलों में छुपकर बैठे रहते थे | वो हमें प्यार करना चाहते थे और हम उन्हें खा जाना | हम सब एक हसीन मोत के साथ सो जाना चाहते थे पर हमें श्राप लगा था |
दुःख हमें इतना तो मीठा लगने लग गया था की सुबह- शाम हम उसमे उंगलियाँ  डुबों कर डबल रोटी की तरह खा लेते थे |
उस अभिशाप से पहले हम खुश थे, हम हमारी बीवियों के पेरों में मेहँदी लगाते थे, उन्हें साड़ियाँ पहनाते थे,उनके माथे पर चुम्बन और बिंदियाँ चिपकाते थे | हम अपने बच्चों को चड्डीयाँ पहनाते थे और चूँ-चूँ कर बजने वाले जूते भी| हम उन्हें मेलों में रिमोट वाली कार दिलाते थे | बगीचों में झुला झुलाते थे |
सब कुछ कितना सुखद था उस अमरता के अभिशाप से पहले |
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 E- magzine  दखलंदाजी http://www.dakhalandazi.com/2011/10/storypankaj.html पर प्रकाशित |
Photo source: www.deviantart.com

Wednesday, October 26, 2011

दसवीं वालों का जवान होता शहर


सारी दुनिया उज्जैन के मंदिरों की दीवानी है और उज्जैन इसके शौपिंग मॉल्स का | उज्जैन दो भागो में बँटा है-पुराना शहर और नया शहर| पुराने शहर में पुराने हो चुके देवता और मंदिर रहते है तथा नए शहर में अभी-अभी जवान हुए मॉल्स,बिल्डिंग्स और खुबसूरत लोग | दुनिया पुराना शहर घुमने जाती है और पुराना शहर नया शहर घूरने सॉरी... घुमने जाता है |

यही बात हम स्टुडेंट्स पर भी लागु  होती है और वो भी पूरी शिद्दत के साथ | पुराने शहर वाले लडको की दाढ़ी और मुच्छों पर जैसे ही बाल  आना शुरू होते है वे नए शहर की और कूच कर जाते है | अगर दसवी के बाद आपने साइंस लिया है तो आप यहाँ शाहरुख़ खान है आपकी "मन्नत" नए शहर में कुकुरमुत्तों की तरह उगें कोचिंग क्लासेस है |और यदि आर्ट्स या कॉमर्स लिया है तो आप यहाँ सिर्फ "डिनो मोरिया" बन के रह जाते है| आप सिर्फ मार्कशीटों पर ही स्टुडेंट्स कहलाते है,लोगो की नज़रो में आप अफगानिस्तान वासियों की तरह दयनीय प्राणी बन के रह जाते है...साला पुराना शहर विकासशील भूटान और नया शहर विकसित अमरीका सा लगने लगता है| नए शहर को लोग 'फ्री गंज एरिया' कहते है क्योकि फ्री गंज नए शहर की शुरुआत करने वाला क्षेत्र है | आप इसके नाम पर मत जाइए क्योकि यहाँ चीज़ें उतनी ही महंगी है जितना इसके नाम में सस्ते  पन  का एहसास |

नए शहर और पुराने शहर को जोड़ने वाला सिर्फ एक ही ब्रिज है| ओफ़िशिअल नाम मूर्धन्य पत्रकार ठा.शिव प्रताप सिंह  ब्रिज और मुह्बोला नाम 'फ्रीगंज का पूल' | 'फ्रीगंज का पूल' किंगफिशर  की 'फ्लाईट' लगने लगता है की चढ़ते ही नए शहर में 'लैंड' करवा देगा | इस पूल पर एडवरटाइस बड़े बड़े होर्डिंग्स और फ्लेक्स के रूप में लगे रहते है | (कुछ दिन पहले ) पूल से उतरते ही एक नयी बनने वाली सिटी(कॉलोनी ) का एड लगा था जिसमे  सुविधाएँ  दर्शाने के लिए पार्क, मंदिर और हॉस्पिटल के साथ स्विमिंग पूल का भी फोटो था | स्विमिंग पूल में एक लड़की खड़ी थी, जाहिर सी बात है की लड़की ने स्विमिंग पूल में सलवार सूट नहीं पहना होगा| उस लड़की की फोटो को खरोंच दिया गया | पता नहीं किसने खरोंचा -नगर निगम ,एड कम्पनी  या  धर्म रक्षक| निगम को 'सेवा' से फुर्सत नहीं है ,एड कम्पनी को बिजनेस से तो फिर आप समझ ही गए होंगे की नहाती हुई लड़की किसकी दुश्मन रही होगी |

खैर...अच्छा ही किया...जिस पुराने शहर के लड़के 'टी -शर्ट' वाली लडकियों को देखने के लिए पगलायें जाते है वो यदि स्विमिंग पूल में खड़ी लड़की की फोटो को देखते हुए ब्रिज पार करते तो फ़ोकट में एक्सीडेंट 'कर-कुरा' के' मर-मुरा' नहीं जाते |

 दुश्मन से याद आया की  आप वेलेंटाइन डे  के दिन अपनी बहनों को बाइक पर बिठा कर कॉलेज नहीं छोड़ सकते है क्योकि ये उज्जैन के धर्म रक्षको के सविधान के खिलाफ है | धर्म रक्षक युवको का समूह दिन भर प्रेम में आकंठ डूबे लड़के-लडकियों को पीटने के बाद शाम को गम में डूब जाता है| ना...ना प्रायश्चित करने के लिए नहीं बल्कि इस बात को लेकर की दिनभर लंगूर जैसे लोगो की अंगूर जैसी गर्ल फ्रेंड देखने को मिलती है और हम यहाँ साला मंदिर का घंटा बजाते रह जाते है |

कभी कभी आपको IIT की एंट्रेस परीक्षा में सफलता दिलवाने के दावे करते हुए (टाई लगाकर हाथ बाँधे हुए) टीचर्स भी एड में दिख जायेंगे,ये अलग बात है की उन्होंने बी.एस.सी  भी हांफते  हुए निकली हो|

एक बार पूल की दीवारों पर एक नीला हाथी बना हुआ दिखाई  दिया नीचे लिखा था बहन मायावती के सानिध्य में ब्ला ब्ला ...जब में पूल से गुजरा तो हाथी रोते हुए बोला की आपके यहाँ लोगो को 'कमल के  फूल' और 'हाथ के पंजो' से ही फुर्सत नहीं है ...मैने उसकी बातो को सुना-अनसुना  कर दिया| अगले दिन फिर जब मैं पूल से गुजरा तो देखता हूँ की हाथी सिकुढ़ गया है और उस पर उछलती हुई  कटरीना कैफ का शान से चिपकाया हुआ फोटो  लगा है  और लिखा हुआ है :- सुपर हिट- शीला की जवानी |

पूल के ख़त्म होते ही 'घंटा घर' चौराहा आ जाता है,आस-पास कई चाट के ठेले लगे रहते है इसे 'चौपाटी' कहते है चौपाटी पर पनपने वाली प्रेम कहानियो के बारे में बाद में  बात करेंगे...पहले ये की दसवीं पास करते ही स्टुडेंट्स नए शहर में घुसपेठियों  की तरह घुस जाते है | दसवी तक भले ही नाक पोछनें की फुर्सत ना हो पर नए शहर की कोचिंगो में जाते ही आदमी में एक स्टेंडर्ड आ जाता है -ऐसा लोग कहते है|

और ये देखकर तो साला ख़ुशी के मारे मर जाने का मन करने लगता है की छुटा हुआ कोर्स पूरा करवाने के लिए असिस्टेंट लड़कियां आपके पास बैठ कर पढ़ाती है| इतनी ख़ुशी तो मुझे तब भी नहीं हुई थी जब २००४ में दिग्विजय सिंह के दस सालो के (कु या सु ?) शासन का अंत हो गया था और विधानसभा (म. प्र.) का चुनाव जीत कर उमा भारती मुख्या मंत्री बन गयी थी | और ख़ुशी इस लिए हुई थी क्योंकि  मैं गाँव में रहता था इस लिए मुझे लगता था की अब इलेक्ट्रीसिटी कभी नहीं जाएगी पर ऐसा नहीं हुआ | उलटे उमा भारती चली गई -बी.जे.पी और कुर्सी दोनों छोड़  कर|

खैर अब कोचिंग पढ़ाने वालो की  खाल उधेड़ लेते है | फिजिक्स पढ़ाते टीचर इतना तो डबल मीनिंग भाषा में पढ़ाते है की आप सोचने लग जाते है की यहाँ फिजिक्स के सर्किट पढ़ रहे है या दादा कोंडके की फिल्म देख रहे है - अँधेरी रात में दिया तेरे हाथ में |
कई तरह के टीचर अपने पास कई तरह के फीचर होने का दंभ भरते है -
कोड्स, शोर्ट ट्रिक्स ,मंत्रास
पर होता है साला सब फालतू बेमतलब बकवास|
पुराने शहर का लड़का नयी कोचिंग पर आकर ये नहीं पूछता की फिजिक्स,केमेस्ट्री और मेथ्स की बुक के राइटर का नाम क्या है  बल्कि वो ये जानना चाहता है की काले सलवार सूट पहने लड़की का नाम क्या है ? जो स्कूटी पर आती है उसका बॉय फ्रेंड भी है या नहीं ...सबसे ज्यादा रिक्वायरमेंट खुले बालो और जींस टी -शर्ट अटकाएं लड़कियों की होती है | लड़के सबसे पहले नए शहर की खुली फ़िजाओ में प्यार में पड़ जाना चाहते है | किसी लड़की को लेकर चौपाटी ,के.डी. पैलेस या इस्कान मंदिर ले जाना चाहते है | पुराने शहर  के सारे मंदिर और देवता नए शहर के इस्कॉन मंदिर की और जाते प्रेमी जोड़े को देख कर उदास हो जाते है | आप तो जानते ही है इस्कॉन: अमीरों का भगवान | इस्कॉन का पुराने शहर वालो के बीच एक स्टेटस है|

जब इस्कॉन के रेस्तरां में प्रेमी और प्रेमिका आँखों में आँखें डालकर समोसा या केक खाते होंगे तो उस स्टेंडर्ड युक्त  मॉर्डन भक्ति योग के वातावरण में प्रेम वैसे ही बढता होगा जैसे पुराने शहर वालो की नए शहर के स्टेटस में रहने की भूख|
(मैं किसी राजनैतिक पार्टी का समर्थक नहीं हूँ | लेख में पार्टियों के नाम सिर्फ राजनैतिक प्रभाव दर्शाने के लिए प्रयुक्त किये है )
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दीपावली पर लॉन्च हुई E-magzine नजरिया पर  जवान होता शहर के नाम से प्रकाशित