Wednesday, October 30, 2019

तेरी सांसो की गीली सड़क पर

तेरी सांसो की गीली सड़क पर,
हजार बार फिसला हूं मैं l

रोशनी की तो बात ही छोड़
तेरे अंधेरों के लिए भी तरसा हूं मैं l

अब बारिश बन गई है तो
तोड़ भी जा मेरी छाती l

देख यूं तिनकों की तरह,
घुटनों पर सिमटा हूं मैं l

लेख - सफाई कर्मियों के लिए

सफाई कर्मियों  को दिवाली के अगले दिन तथाकथित प्रसाद के नाम पर पकवान या पैसे मांगना बंद कर देना चाहिए क्योंकि ये एक गुलाम प्रथा का सिंबल है जिसे उन्होंने सदियों से भोगा हैl

सफाई कर्मी भाइयों और बहनों, आप लोग गुलाम नहीं है और आप जिनसे मांग रहे हो वह आपके मालिक नहीं है l आप ठीक उसी तरह सर्विस प्रोवाइडर हैं जैसे टीचर पढ़ाने की सर्विस देता है और और डॉक्टर इलाज करने की l

दलित संगठनों को चाहिए कि वह अपने लोगों को शिक्षित करें कि उच्च जातियों के लोगों के सामने हाथ ना फैलाएं l आपसे सफाई करवा कर  वह लोग आप पर कोई एहसान नहीं कर रहे हैं l

अगर आप लोग सफाई करना बंद कर दो  तो उल्टा सुंदर शहर कूड़ा घरों में तब्दील हो जाएंगे और वह लोग अपनी जातिगत श्रेष्ठता के मारे इतने लजाएंगे कि उनके हाथ से झाड़ू भी नहीं उठेगी l

ना तो आप उनसे छोटे हैं और ना ही आपका काम  उनसे किसी मायने में छोटा है l बल्कि वह गंदगी करने वाले हैं और आप उस गंदगी को साफ करने वाले हो l

वो दिवाली बनती थी

शक्करपारा होे जाने के मेरे दिनों में,
वो मीठी चाशनी बन जाती l

गुझियों के खोल में अगर मैं बदल जाता
वो खुशबूदार भरावन सी भर जाती l

मेरे रात हो जाने कि सदियों में,
वो दिवाली बनकर कर मुझे बचाए रखती थी l

इस दिवाली कुछ ज्यादा ही रोशनी रहेगी

तुम आओगी तो
आतिशबाजियां हो जाएंगी दिल में,

नहीं तो इंतजार में तुम्हारे
दिया बनाकर जलाना तो है ही इसे.

लगता है इस दिवाली कुछ ज्यादा ही रोशनी रहेगी

कहानी - गेहूं की कथा

परियों की जगह गेहूं की कथाएं सुनाएं जाने लगी थी l इंजीनियर से किसान बने उस बूढ़े को अब भी यकीन नहीं होता था कि धरती ने गेहूं की फसल उगाना बंद कर दिया है l

उसकी बूढ़ी पत्नी की हथेलियों में गेहूं की खुशबू आती थी l वह जब तक जिंदा थी, बूढ़ा उसकी हथेलियों को हर रोज सूंघता था और गेहूं के स्वाद को अपनी स्मृति में बचाए रखने की कोशिश करता था l

उसका पहला चुंबन भी उसे सिर्फ इसलिए याद नहीं आता कि वह काफी रूमानियत भरा था बल्कि इसलिए याद आता था कि वह गेहूं के खेतों में घटित हुआ था l

जब उसकी पहली प्रेमिका के आग्रह पर उसने उसे चूमा था तो उसके कानो मैं इतनी जोर से सीटी बजी थी कि उसे गेहूं के खेत में हवाओं के सर्राटा लगाकर दौड़ने की आवाज भी नहीं आई थी l

उसे अब अब लगने लग गया था कि उसकी स्मृति में प्रेमिका का चेहरा जैसे धुंधला गया है परंतु गेहूं की बालियां अभी भी उतनी ही सुनहरी और ताजी है l

बाकी लोगों की तरह उसे वैज्ञानिकों का बनाया हुआ सिंथेटिक फूड खाना पसंद नहीं था और उसे लगता था कि जैसे पिछले 37 साल से उसका पेट भरा नहीं है l

उसे लगने लग गया था कि भूख उसके पेट में एक पौधे की तरह उग रही थी जो एक दिन बड़ी होकर उसके शरीर को फाड़ डालेगी l

संस्मरण - मेरी मोहब्बत थी उनकी क्रांति थी

मैं जल्दी से किसी के प्यार में पागल हो जाना चाहता था पर यह लग्जरी मेरे पास नहीं थी  क्योंकि पहला तो यह कि मैं 21 का होते हुए भी 15 साल के बच्चों की सी मासूमियत अपने चेहरे पर लिए हुए घूम रहा था और कॉलेज में रोज-रोज यही मंत्र सिखाया जा रहा था कि लड़कियां लड़कों पर मरती है बच्चों पर नहीं l

और दूसरा यह कि मेरा पहनावा मेरा फैशन सेंस भिखारी होने की हद तक खराब था और कोई चाह कर भी मेरे प्यार में पागल नहीं हो सकता था l

इन सबके बीच,  मैं लिखने लग गया था और फिर इस लिखने ने मेरी दोस्ती दो ऐसे क्रांतिकारियों से करवाई जो 2011 कि ठंड में तत्कालीन सरकार के खिलाफ क्रांति की गर्मी पैदा कर रहे थे l मैं उनके लिए लिखने लग गया था l

और फिर तीन चार महीनों बाद मेरे एक  रिश्तेदार की शादी हुई और मैं वहां गया l मैंने पहली बार उसे देखा l वह इतनी ही सुंदर थी जितनी इस तरह की घटनाओं में किसी लड़की को सुंदर होने का हक होता है l और जैसा मैंने पहले कहा था कि प्यार में पढ़ने की मुझे जल्दी थी कि मैं बिना कुछ सोचे समझे उसके प्यार में पड़ गया l

वह मुझसे लगभग 5 साल छोटी थी l काफी क्यूट थी l मेरी जाति वाली थी इसलिए मुझे उसके प्यार में पढ़ना इतना खतरनाक नहीं लगा क्योंकि पहला तो यह कि उन दिनों ऑनर किलिंग क्या होती है यह मैं अखबारों के जरिए समझ चुका था और दूसरा यह कि मैं अपने माता-पिता को नाराज करने का रिस्क मोल नहीं ले सकता था l मध्यम वर्गीय जो ठहरा l

डर के इन सभी गणितो का ध्यान रखते हुए उसके प्यार में पढ़ना मुझे काफी मुनासिब लगा l वह सब इतना कैलकुलेटेड था कि यदि मेरी शादी उससे होती तो मैं इससे "अरेंज्ड लव मैरिज" कहता l

और फिर उसके प्यार में पढ़ते ही मेरा लिखना छूट गया l जो मैं पत्रकार बनकर दुनिया को बदलने की बड़ी-बड़ी बातें करता था, अब मैं एक बैंकर बनकर या इंजीनियर या ऐसी ही किसी प्रजाति का जंतु बनकर उसके साथ अपना परिवार बढ़ाना चाहता था l उसके प्यार में पागल होना चाहता था l मध्यमवर्गीय जो ठहरा l

इधर मेरे क्रांतिकारी दोस्त मुझे क्रांति पर लिखने के लिए फोन करते थे और मैं था कि उसके ख्यालों में खोया रहता था l मैंने लिखना बंद कर दिया था l

और फिर कुछ दिनों बाद उस लड़की के साथ प्यार का किस्सा ही खत्म हो गया l जैसे उस क्रांतिकारी की क्रांति का किस्सा वहीं कहीं खत्म हो गया था l

वह क्रांतिकारी दिल्ली में बैठकर अब भी शायद अपने पुराने दिनों को याद करता होगा पर उसे अब भी क्रांति मिलती होगी कि नहीं मुझे पता नहीं चलता l

पर मैं अब भी उस लड़की से मिलता हूं तो वह मुस्कुरा देती है l

-  पंकज देवड़ा

लघु कथा -भीड़ में इश्क

उस कमरे में जब वो लड़की उस लड़के को पिघला देने की हद तक बाहों में भर रही थी तब कुछ लोगों की भीड़ ने अचानक से दरवाजा तोड़ दिया l

उस भीड़ ने कहा कि हमारी महान संस्कृति अनाज के भूसे कि तरह इतनी कमजोर है कि दो शरीरों के मिलन की गर्मी से भभक सकती है l इसलिए उन प्रेमी जोड़ों के शरीरों को टूटना होगा l

तभी उस लड़की ने कहा कि उनके शरीर कोई मंदिर या मस्जिद नहीं है जिनको तोड़े बगैर महान धर्मों या संस्कृतियों की रक्षा हो नहीं सकती है l

भीड़ ने इस बात को अनसुना कर दिया और इसके बाद उन प्रेमियों के रक्त की ऋचाएं दीवारों पर लिख दी गई l

लड़कियों को नहीं देखने का व्रत

लड़कियों को नहीं देखने का व्रत लिया था मैंने l उन 5 सालों के दौरान मिली पांच लड़कियों के भी चेहरे याद नहीं आते l

कभी कभी तो ऐसा होता था कि कॉलेज में कोई लड़की कहती कि मैं तुम्हारे साथ स्कूल में पढ़ती थी तो लगता था कि स्कूल के दिन किसी और जन्म की बात रहे होंगे l क्योंकि मैंने 15 से 19 की उम्र के बीच साधु बनने की ठानी थी और ब्रह्मचर्य इसकी पहली शर्त था l

मैं सुंदर मोक्ष की कामना करता था पर लड़कियों की सुंदरता से डरना चाहता था l

12वीं शुरू हुई थी l मैं उज्जैन की एक प्रसिद्ध कोचिंग पर मैथ्स पढ़ने गया l छूटा हुआ कोर्स पूरा करवाने के लिए असिस्टेंट लड़कियां पास बैठकर पढ़ाती थी l

वो उनमें से एक थी l जब वो पढ़ाती थी तो सवाल तो दूर सांस लेना भी याद नहीं रहता था l और अगर गलती से कोई सांस आती भी थी तो इतनी गर्म होती थी कि ब्रह्मचर्य का व्रत पिघल जाता था ,सन्यास की इच्छा पीछे छूटती जाती थी और कभी-कभी तो एक जन्म भी कम पढ़ने लग जाता था l

पसीने ऐसे छूटते थे कि लगता था कि शिप्रा का उद्गम मेरे ही सिर से हुआ होगा l

फिर कुछ हालात बने और कोचिंग छूट गई ब्रह्मचर्य बचा रह गया l और साल भर बाद ब्रह्मचर्य और मोक्ष दोनों की इच्छा छूट गई l

मुक्ति का बंधन टूट गया था, मैं मरना और फिर जन्मना चाहता था l मैं प्यार करना चाहता था l

और अब ऐसा होता है कि मोक्ष याद नहीं आता उसकी आंखें अब भी याद आती है l

Thursday, October 10, 2019

इश्क में दाल बाटी बन जाना

तुम चाय बन जाओ यार,
मैं बिस्कुट बन जाता हूं l
अपने तमाम करकरेपन के साथ,
मैं तुममें घुल जाता हूं l

मैं बाटी हूं राख लगी,
आओ मुझे चूर दो l
घी शक्कर बनकर इतना मुझे बुर दो,
कि मैं चूरमा बन जाऊं l
कि मैं तुमसे अपने जर्रे जर्रे को तर कर जाऊं l

और क्या-क्या बने इश्क की इस रसोई में,
चलो सब छोड़ दो l
एक काम करो तुम मुझे बाहों में भरो,
और दम लगाकर तोड़ दो l

- पंकज देवड़ा

#poetry #dal #baati #love

कपड़ों की लंबाई संस्कृतियों की महानता छोटा नहीं कर सकती

प्रिय मम्मीयों और डैडीयो,
मना ली नवरात्रि ? अब अपने बेटों को भी समझा देना कि जिस तरह एक औरत की मूर्ति का सम्मान किया उसी तरह जीती-जागती का भी कर ले l

कभी किसी लड़की से बात करें तो बेशरमो की तरह उनकी छातिया देखने के बदले उनकी आंखों में देखें क्योंकि लड़कियां सिर्फ छातिया नहीं है l इंसान है, जीती -जागती, जो हंसती भी है और रोती भी l

फेसबुक और इंस्टाग्राम पर किसी अनजान लड़की से बात करें और वह यदि इंटरेस्टेड नहीं हो तो कुत्ती-कमीनी जैसी गाली देकर अपनी औकात नहीं दिखा दे क्योंकि वो "लड़की" हो ना हो लेकिन तुम जरूर इस तरह भोक कर अपना कुत्ता होना साबित कर रहे हो l

कभी कोई लड़की थोड़ा ज्यादा हंस बोल ले तो उसका कैरेक्टर सर्टिफिकेट बना कर दोस्तों के बीच जारी मत कर देना क्योंकि जैसे तुम्हारा हंसने बोलने का मन करता है वैसे ही उनका भी करता है l वे भी इंसान हैं l सिर्फ प्यार करने की मशीनें नहीं है l

कभी कोई लड़की नाभि-दर्शना, पीठ-दर्शना या पैर- दर्शना वस्त्र पहन ले तो उसे  ताड़-ताड़ कर अनकंफरटेबल मत कर देना  या उसे भारतीय संस्कृति का ज्ञान मत पिला देना l कपड़ों की लंबाई संस्कृतियों की महानता को छोटा नहीं कर सकती l

उम्मीद है कि "सुंदर सुशील गुणी बहू" पैदा करने की फैक्ट्री बना हुआ यह समाज अपने लड़कों को भी सिखाएगा की कैसे एक लड़की को सिर्फ मां, बहन, बेटी या देवी के रूप में ही नहीं देखना है बल्कि एक स्वतंत्र व्यक्तित्व के रूप में उसका और उसके विचारों का सम्मान करना है l
#women #equality #respect

जातिगत श्रेष्ठता व शाब्दिक हिंसा के दम पर अपना दबदबा बनाए रखने वाला समाज

सोनी को सुनारटा, दर्जी जात वाले को दरजेटा,  नाई को नव्वा नाम से गाली नहीं दी तो हमारे समाज में गाली देने का सुख लोगों की जिबान को नसीब नहीं होता है l

जब तक ब्राह्मणों को मांगने वालों के साथ और राजपूतों को पियक्कड़  या गरम खोपड़ी से मिलते जुलते किसी विशेषण से सम्मानित नहीं किया तो मतलब गुस्से का पूरा इज़हार नहीं हुआ l

मेरे गांव में पाटीदार और कुमावत समाज के लोगों के बीच दुश्मनी चलती रहती थी और इसी दुश्मनी को जाहिर करने के लिए कुमावत समाज के लोग पाटीदारों को कागला और पाटीदार समाज के लोग कुमावतो को टेपला नाम देकर अपनी जातिगत श्रेष्ठता प्रदर्शित करते थे l

और हां, SC  की जातियों  को हम कैसे भूल सकते हैं, जूते सिलने वालों और सफाई करने वालों की जातियां,  सदियों से अपमान सहने वालों की जातियां,   अपनी जातियों के नामों को गंदी गालियों में तब्दील होने से बचाने का संघर्ष करने वाले लोगों की जातियां l

10 -12 साल के स्कूली बच्चे जो ऊंची जाति से संबंध रखते हैं वे दलितों को चमाड़ला कहकर अपना गुस्सा दर्शाते हैं l

और ST का आदिवासी भील समाज जिसके लोगों की गरीबी का मजाक उड़ाने के लिए उनकी तुलना बंदर से की जाती है उन्हें "मामा" कहां जाता है और वह भी उन लोगों द्वारा जिनके महल उन्हीं आदिवासियों द्वारा दिए गए व्यापार से खड़े किए गए हैं l

और इससे भी ज्यादा आश्चर्यजनक तो यह जिन धर्मों में जातियों का कॉन्सेप्ट नहीं है वह भी जातियों को उतनी हि तत्परता से मानने का प्रयास करते हैं जितना हिंदू धर्म के लोग करते हैं l

जैसे एक जैन या मुस्लिम भी किसी दलित के लिए वही हेय भाव रखेगा जो एक हिंदू धर्म वाला उनके लिए रख सकता है l

इस्लाम जिसकी स्थापना समानता के आधार पर की गई थी वह भी भारत में आकर जातिगत भेदभाव से बच नहीं सका और उसमें भी उच्च कुल के मुस्लिम झाड़ू लगाने वाले या ऐसे ही किसी काम को  करने वाले मुस्लिम परिवारों को नीची निगाहों से देखते हैं l

खान, शाह, मंसूरी, मेव, हेला इस्लाम के अंदर पनपने वाली जातियों की हायरारिकी है l

दरअसल हमारा समाज एक ऐसा समाज है जो एक दूसरे को दबाना चाहता है l जातिगत श्रेष्ठता व शाब्दिक हिंसा के दम पर  अपना दबदबा बनाए रखना चाहता है l सबसे छोटी जाति का व्यक्ति भी यह सोच कर खुश है कि उससे छोटी भी कोई एक जाति है  l जिसे वह गरिया सकता है l

धन्य है भारत का जातिवाद और धन्य है यहां के लोग जिनके लिए एक जीते जागते इंसान से बढ़कर उसकी उस जाति का महत्व होता है  जो दरअसल कहीं नहीं है बस उनके दिमाग की उपज है l

गांधी से नफरत करते हो तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है

मेरे भारतवासियों अगर तुम में से अधिकतर लोग गांधी से नफरत करते हो तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है क्योंकि दरअसल देखा जाए तो तुम लोग गांधी को डिजर्व ही नहीं करते हो  l

गांधी को प्यार करने के लिए तुम्हें अहिंसक होना होगा,   माफी देने वाला होना होगा और यह करना बहुत मुश्किल है l  इसके लिए ज़मीर में बहुत ताकत लगती है l तुमसे ना हो पाएगा l

तुम्हारे लिए बहुत आसान है कि अपने धर्म को महान बताकर दूसरे के धर्म को गाली देना, तुम्हारे लिए आसान है अपनी जाति को बढ़ा बताकर, उसके इतिहास पर गर्व करके दूसरी जातियों को पैरों तले रौंद डालना l

तुम्हारे लिए आसान है अपने देश को बड़ा बताकर के दूसरे देश को गाली देना और तुम्हारे लिए उतना ही मुश्किल है किसी की गलती को क्षमा कर देना किसी की असहमति को सम्मान  दे देना l

तुम लोग जाओ और जाकर लड़ो मोहर्रम और गणपति विसर्जन में, जाओ और लड़कियों का पीछा करो नवरात्रों में और उनके  कपड़ों  और शरीरों पर भद्दे कमेंट करो और उनको समझाइश दो कि उनकी चमकती हुई पीठ  महान भारतीय संस्कृति की आंखें फोड़ सकती हैं l

जाओ और जाकर टिक टॉक वीडियो बनाओ और वर्चुअली पॉपुलर होने के चक्कर में  रियलिटी से भाग जाओ, जाओ और जाकर किसी नेता के तलवे चाटो उसके नाम की माला जपो तबकी जब वो घुन की तरह तुम्हारा भविष्य खाए जा रहा हो l

जाओ और जाकर गाय के नाम पर इंसानों को मार डालो l जाओ और जाकर किसी को जात के नाम पर गाली दो l जाओ और जाकर  गोडसे जैसे  आतंकवादियों को महिमामंडित करो क्योंकि तुम्हें यही करना है, तुम्हें यही करना सिखाया गया है और तुम्हारा यही करना धर्म और राजनीति के उन ठेकेदारों के लिए फायदेमंद है जो तुम्हारा इस्तेमाल करना चाहते हैं l

तुमसे ना बोला जाएगा सच l तुमसे नहीं पाली जाएगी अहिंसा l तुम लड़ो क्योंकि तुम्हारे पूर्वज लड़ते थे l तुम लड़ो क्योंकि तुम्हारे आस-पास वाले लड़ते हैं l तुम लड़ो  क्योंकि  तुम्हारा जमीर तुमसे लड़ता है, तुम माफ नहीं कर सकते हो l तुम अहिंसक नहीं बन सकते हो और इसीलिए तुम गांधी को प्यार भी नहीं कर सकते हो l

(गांधी से असहमत हुआ जा सकता है परंतु नफरत नहीं की जा सकती है )

संस्मरण - कब तक भागोगे पंकज ?

मैं भगोड़ा था, परिस्थितियों से डरकर भागना मुझे बहुत अच्छा लगता था. 16 की उम्र में एक दिन मैं घर छोड़कर भाग गया क्योंकि मैं मोक्ष पाना चाहता था l साधु बन जाना चाहता था l

27 की उम्र तक लगभग में 10 कंपनियां छोड़कर भाग चुका था l

इसी बीच कुछ रिश्तो के बंधन थे जिनको मैं तोड़कर भाग जाना चाहता था l

एक कंपनी में जब उसके मालिक से लड़ कर भाग रहा था तब मेरे दोस्त ने मुझसे कहा था -"कब तक भागोगे पंकज ?"

उसका यह सवाल जैसे दिन-रात मेरा पीछा करता रहता था मैं जब भी कुछ छोड़कर भागता था मेरे दिमाग में उसका यह सवाल टेप रिकॉर्डर की तरह बजता रहता था l

2016 में, मैं मुंबई भाग चुका था ताकि फिल्में बना सकूं l लेकिन मुंबई पहुंचते ही एक कमरे की पिछली खिड़की से मैं लोगों को आते जाते देख रहा था और सोच रहा था क्या यही वो पल है जिसके लिए मैं सब कुछ छोड़ कर भागना चाहता था और इसका जवाब "ना"आया और उसी पल में मुंबई छोड़कर भाग आया.

मैं अपने भगोड़ेपन से परेशान हो चुका था, मेरा डिप्रेशन सुसाइडल होने की हद तक बढ़ चुका था मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मैं अपनी मुसीबतों से कैसे भाग जाऊं ?

न दिल्ली में मुझे मोक्ष मिलता था ना मुंबई में मुझे सुकून  , ना अध्यात्म मुझे जीवन कि संपूर्णता दे पा रहा था और ना ही फिल्म मेकिंग जिंदगी जीने का लक्ष्य l

क्या है वो जो मुझे शांति दे दे ? क्या है वो जो मुझे अपने आप से मुक्ति दे दे? मेरी चिंताओं से, मेरी समस्याओं से पीछा छुड़ा दे ? तभी एक जादू हुआ जिसने मेरी पूरी जिंदगी बदल दी l

वह जादू यह था कि मैंने अपने आप को स्वीकार कर लिया था अपनी संपूर्ण कमियों और खामियों के साथ, अपनी वीभत्सताओ के साथ l मैंने अपनी गलतियां own की क्योंकि उसके लिए मैं किसी और को दोष नहीं दे सकता l

हां मैं भगोड़ा था क्योंकि मैं सुख की तलाश में भटकता था, मैं मोक्ष पाना चाहता था क्योंकि मैं अमर होना चाहता था, मैं फिल्में बनाना चाहता था क्योंकि मैं प्रसिद्ध होना चाहता था l

एक इंसान होने के नाते चाहना गलत नहीं है,  उसके लिए कोशिश करना गलत नहीं है, कोशिश करते हुए असफल हो जाना गलत नहीं है, डरना गलत नहीं है, भाग जाना गलत नहीं है l

मैंने खुद को माफी दे दी और उसी दिन मैं मुक्त हो गया l

लड़कियों तुम बहुत पागल हो!

लड़कियों तुम तो सच में बहुत पागल हो कि रेप जैसी छोटी सी बात के लिए इतना हल्ला मचाती हो l

क्यों बोला तुमने कि स्वामी चिन्मयानंद ने मेरे साथ रेप किया, नहीं बोलना था तुम्हें क्योंकि स्वामी चिन्मयानंद हिंदू धर्म के गुरु है l क्या हुआ यदि उन्होंने  हर सुबह के 6:00 बजे तुमसे मसाज करवाना और दोपहर के 2:30 बजे तुम्हारा बलात्कार करना चाहा l

तुम्हें चुप रहना था क्योंकि वह स्वामी है उनकी सेवा करना धर्म की सेवा करना है उनकी सेवा में तुम अपना शरीर भी समर्पित कर दो फिर भले ही वह तुम्हारे शरीर को गिद्द की तरह नोच कर खा जाएं l

क्यों तुमने स्वामी चिन्मयानंद पर रेप के आरोप लगाए जबकि वह तो इस देश की सबसे बड़ी राष्ट्रवादी पार्टी बीजेपी के मंत्री हैं l पूरी दुनिया गलत हो सकती है पर बीजेपी कभी गलत नहीं हो सकती l वह हमेशा देश का भला चाहती है और इस देश के भले के ढोंग में अगर तुम जैसी दो-चार लड़कियां अपना शरीर हवस की आग में आहूत कर दे तो इसमें बुरा ही क्या है l

देखो इसके मुखिया मोदी जी 18 घंटे काम करते हैं उनके चमचे दिन रात उनको बचाने में अपनी उर्जा नष्ट करते हैं और ऐसे में यदि कोई चमचा या मंत्री या जानवर तुमसे बलात्कार करना चाहे तो तुम्हें इसमें आपत्ति नहीं लेनी चाहिए l

लड़कियों सच में तुम बहुत पागल हो कि इस खूंखार वक्त में तुम स्वामी चिन्मयानंद जैसे धर्म के ठेकेदार राजनीतिज्ञों से लोहा ले रही हो क्योंकि अंत में विजय उन्हीं की होगी जिनके हाथ में सत्ता है l तुम्हारे हाथ तो सिर्फ आंसू ही आएंगे l तुम रो लो जी भर के क्योंकि न्याय सिर्फ कविताओं में बचा हुआ है l

एक बोली है मालवी

एक बोली है मालवी,
जब रोती है तो उसकी आंखों से
टपकते हैं खून से सने शब्द l

क्योंकि उसके अपने ही लोग,
उसे चुप करा कर,
गाड़ देना चाहते हैं अपने ही आंगन में,
ताकि बोया जा सके एक पौधा
जो उगाए एबीसीडी और "अनाराम"

जैसे बची रहती है कोई विधवा मां,
अपने बच्चों के बीच,
ठीक वैसी ही बची हुई है वह,
उन लोगों के बीच,
जो माने जाते हैं सृष्टि से भी पुराने,
और जब वह रोते हैं इस बोली में,
तो दुनिया हंसती है उनके आंसुओं पर,
उन्हें गवार कहकर l

एक बोली है मालवी,
जो उगती है कपास के फूलों में,
जात्राओं और हाटो के झूलों में l
जो खाती है कुल्फी,
लड़ाती है इश्क l
गाती है संजा,
और फिर मार दी जाती है,
अपने ही कुलों में l

- पंकज देवड़ा

मैं पत्रकार लिखूंगा तुम रवीश कुमार समझ लेना

...और जब कि इस मायावी वक्त में  जब न्यूज़ चैनलों पर सरकार के तलवे चाटने वाले दलालों का दबदबा है जो अपनी वफादारी से कुत्तों को भी मात दे दे l

और जो अपने गलों में एक अदृश्य पट्टा डाले हुए दिन रात कुछ इस तरह भोंकते हैं कि उनकी हर भोक में एक  नेता महान की चरण वंदना सुनाई देती है l

जिनकी गले से निकलती हुई हर चीख का सिर्फ एक ही मकसद होता है कि सरकार के खिलाफ उठने वाली आवाजों का दमन किया जा सके l

जिन्होंने राष्ट्रवाद के नाम पर हिंदुस्तान की रगों में हिंदू मुस्लिम का ऐसा तेजाब फैला दिया है कि इसकी आवाम हर बढ़ते दिन के साथ और भी ज्यादा खूंखार हिंसक कट्टर और एक दूसरे की खून की प्यासी होती जाती है l

ऐसे खूनी असहिष्णु और हिंसक समय में इस अहंकारी सत्ता से हर पल लोहा लेने वाला इसकी आंखों में आंखें डाल कर इसकी गलती बताने वाला एक ऐसा पत्रकार भी मौजूद है जिसने अभी तक भारतीय पत्रकारिता स्तर नीचे गिरने से बचाए रखा है l

ऐसे महान पत्रकार रवीश कुमार को लोकतंत्र की आवाज बनने के लिए रमन मैग्सेसे पुरस्कार दिया जाना एक भारतीय होने के नाते बड़े गर्व का विषय है आदरणीय रवीश कुमार जी को बहुत-बहुत बधाई l