Sunday, April 17, 2011

उस पगली का प्रेम निवेदन


मैंने जैसे की पहले भी कहा था की मैं न जाने क्यों उन लोगो को सोचने में अपना वक्त बर्बाद कर देता हूँ, जो भूल कर भी मेरे बारे में नहीं सोचते होंगे .
                                                    मैं सोचता हूँ उस लड़की के बारे में जो मेरे मामाजी के पड़ोस में रहने वाले लड़के की शादी में मेहमान बनकर आई थी.मैं आठवी में होऊंगा जब उस लड़की ने मुझसे मिलने के तीन-चार घंटो बाद ही मेरे पेरों में एक चुलबुलाहट भरी गुदगुदी  की ,जो ये बताने के लिए काफी थी की वो दसवी में पढ़ती थी.और उसकी इस परिपक्व हरकत के बाद मैं अन्ताक्षरी का वो खेल छोड़कर भाग गया जिसमे हरने वाली टीम को "चूड़ियाँ " पहनाने का रिवाज था.उसे शायद मेरी शक्ल पसंद  थी पर मेरा बचपन नहीं.वो मुझे जल्दी से बड़े होते देखना चाहती थी .उसका बस चलता तो वो 'कोम्प्लैन'  या  'बोर्नविटा' टाईप   के हजारो डिब्बे  उस एक रात में पिलाकर मुझे बच्चे से बड़ा बना देती जिसकी अगली सुबह उसने मुझे "आई लव यू " कह दिया था.और इसके बाद में  दोड़कर  पीछे वाले कमरे में  दरवाजा  लगाकर  छुप गया था. शायद उसे  मेरा जवाब उस बंद दरवाजे पर  टंगे हुए ताले  की झूलती हुयी चाबी ने दे दिया था .
                                                                               उस पगली के इस अजीब से प्रेम निवेदन के  आठ साल  बाद फिर में अपने मामाजी के पड़ोस में रहने वाली  लड़की की शादी में गया , फिर वो पगली लड़की मुझे दिखी,
इस बार मैंने उसे एक 'स्माइल'  दी. वो लड़की मुस्कुराकर शर्माते हुए अपने कमरे में चली गयी .जाने से पहले  उसने अपने दोनों बच्चो को गोद में उठा लिया था.
                                                                        मैंने देखा की उसके कमरे का दरवाजा  आधा खुला हुआ है,जिस पर एक  ताला लटक रहा है , उस ताले में एक चाबी लगी है  जो अभी तक झूल रही है .
         (यह वास्तविकताओ पर आधरित एक कल्पनिक घटना है )
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image-hindustantimes.com
 

मैं छत पर टहलता हूँ अपनी

मैं छत पर टहलता हूँ अपनी 
तब भी 
जब लिम्बूं के आचार की बरनी 
माथे पर कपड़ा बांधे  
धुप में 
बेठी नहीं रहती, 
तब भी 
जब वो  लड़की उसकी छत पर
किताबो की आढ़ से
किसी को देखा नहीं करती,
तब भी 
जब तुलसी के पौधे 
और  अटारियों  के बीच
पिद्दी  सी मकड़ी 
जिद्दी से जाले नहीं बुनती,
तब भी  
जब पड़ोस की भाभी 
कपड़ों और गीली इच्छाओं को 
उन रस्सियों पर नहीं सुखाती, 
तब भी 
जब  ताजी सी दुल्हन 
पुरानी छत पर खढी हो 
नए रिश्ते नहीं चुनती, 
तब भी 
जब  उन  ऊँघे हुए रास्तों पर
बेशर्म बाराती, पगलाया दूल्हा 
बेसुरे बाजे, खास्ता जेनरेटर 
और सफेदपोश ट्यूब लायटे
नहीं घुमती



Monday, April 4, 2011

उसका हाथ मांगनें के लिए

मैं  न जाने  इतना  क्यूँ  सोचता  रहता  हूँ . मेरा  दिन  भर उन  लोगो  को  सोचने  में बर्बाद हो जाता है ,जो शायद मेरे बारे में  भूल  कर  भी नहीं  सोचते होंगे.  मैं  आसमान  में उड़ते  उस हवाई जहाज के बारे  में  भी सोचता हूँ ,जिसके  पाइलेट का  अगर बस  चले तो मेरे मुँह पर  ही थूक  दे.
                                                              मै उस लड़के के बारे में भी सोचता हूँ जो मेरे साथ 10 वी में पड़ता था.वो हमेशा एक जैकेट पहने रहता था जिस पर N लिखा होता था लेकिन उसका नाम  R से शुरू होता था.वो हमेशा शराब के नशे में डूबा रहता था.उसकी पढ़ी -लिखी माँ अपना चश्मा साफ़  करते हुए कोचिंग पढ़ाते टीचर के पास आती है,और उस लड़के को समझाइश देने के लिए कहती है. जब टीचर  समझाते हुए, उस नशे में डूबे  बच्चें का हाथ अपने हाथ में लेते है तो वो देखते है की  उसकी आस्तीन के नीचे कलाई से लेकर कोहनी तक एक नाम लिखा है जो शायद उस लड़के ने चाक़ू से अपनी चमड़ी को काट कर लिखा है. ये नाम उस लड़की का पूरा नाम है जिसका पहला अक्षर उसकी जैकेट पर लिखा है .और ये वही लड़की है जो उससे  प्यार नहीं करती क्योंकि वो बदसूरत है.
                                                          मैं उस लड़की के बारे में भी सोचता हूँ ,जो पंडीत जी के घर के पीछे रहती थी. पंडितजी का घर मेरे नाना जी के घर के सामने था. नानाजी का घर उस नदी के पीछे  था, जो गाँव की इकलौती नदी थी,लेकिन अब सुख गयी है. मैं जब भी बचपन में गर्मी की छुट्टियों में वहाँ जाता था तो वो पंडित जी  हमेशा मुझे चिढ़ाते हुएँ मेरा रिश्ता उस लड़की के साथ तय करने की बातें करते थे, वो कहते थे की वो मुझे अपने साथ उस लड़की के घर ले जाकर  उसका हाथ मांगेंगे और मैं  चिढ़ जाता था. वो लड़की मेरी हमउम्र थी और वहाँ रहती थी जहाँ का वर्णन मैंने ऊपर किया है. वो लड़की बहुत हँसती थी अब नहीं हँसती,बहुत बोलती थी अब अब नहीं बोलती. क्योकि  उसके घर के सामने रहने वाले  एक  अमीर किसान के बेटें नें उसके बचपन का बलात्कार कर दिया है. उस लड़की का बाप सिवाय मर जाने के और कुछ ना कर सका. जब मैं इतने सालों बाद वहाँ गया तो मैंने देखा की वो लड़की वहाँ नहीं हैं. काश ! होती तो मैं उन्ही पंडित जी को लेकर उस लड़की के घर चला जाता,उसका हाथ माँगने के लिए.
                                   (यह वास्तविकताओ पर आधरित  कल्पनिक घटनाएँ है )

Saturday, April 2, 2011

वो दिल खाती हैं

झूट कहती हें कुछ लड़किया
की वे शकाहारी हें 
हर दिन सुबह 
नाश्ते में 
एक पागल दिल खाया करती हें 
झूट कहते हें कुछ पति 
की वे अपनी पत्नियों से 
प्यार करते हें 
उनकी पत्नियों की 
औकात 
एक गोल तकिये  से ज्यादा नहीं हें 
जो पड़े रहते थे बगलों में उन दिनों 
जिन दिनों 
कुंवारापन 
बिस्तर की सिलवटे चूमता था 

झूट कहते हें कुछ पागल प्रेमी  
के वे सच्चे प्यार की तलाश में हें 
सच्चा प्यार तब से बेठा हें कही
कोने  में
चार रुपैये की
चूहामार  दवाई खा कर
जब से उसे
पछतावा हुआ हें 
अपने उस एक रात के प्यार पर