Sunday, June 22, 2014

पवित्र चुम्बन

मैं तुम्हे चूमुंगा उतना,
जितना भूख चूमती आँतों को,
आँसू आँख के कोनों को,
और प्यासें पानी को,
तुम्हारे होठों पर उकेरे गए,
सारे अनकहें शब्द, लज्जाएँ,
पवित्र भ्रूण सा अधुरा इश्क़,
दुःख-दर्द और कलाएँ,
मैं समेट लूँगा अपने चुम्बन की
लिजलिजी रूहों में |
और मेरा यकीन मानो मेरी जान,
किसी को भी मुक्त करने की हद तक चूमने के लिए,
नहीं लगता कोई क्रेश-कोर्स,
न ही कोई 101 तरीक़ों वाली किताब,
न हीं कोई समीकरण,
बस चाहिए तो दों होठों के जोड़ें,
जिन पर लीप दी गयी हो नमी,
और भुरभुरा दिए हो प्रेम बीज,
और जब मैं तुम्हारे ऊपर और निचे वाले होठ को
बारी-बारी से चूम रहा होऊंगा,
तो उन्हीं नितांत निजी और तथाकथित अश्लील पलों में,
मैं अपने सारे दुखों से मुक्त हो रहा होऊंगा |

Saturday, May 24, 2014

कहानी- एक लड़की चाँदबाज़...

अनुराग कश्यप के सिनेमेटिकल मास्टरपीस DEV. D का एक दृश्य




एक जोरदार उल्टी करने की नाकाम कोशिश करने के बाद, मैं बाथरूम में ही बैठ गया और तभी मुझे लगा कि जैसे किसी ने मेरे बाएं कान पर चाकू चला दिया हो | मैनें अधखुली आँखों से बायीं और देखा वो चाकू नहीं... नल से टपकी हुई पानी की बूँद थी, जो अभी भी मेरे कान से होती हुई निचे रिस रही थी और जबकि मुझे ये पता चल गया था कि ये पानी की बूँद ही थी, तब भी उसका रिसना मुझे चाकू से खरोंचने जितना ही दर्द भरा लग रहा था | क्योकि यह दिसंबर की कड़कड़ाती ठण्ड का मौसम था |

मैं इतना ज्यादा ठिठुर रहा था कि मुझे लगा जैसे मेरे फेफड़ों की सारी हड्डियाँ लगातार हिलने की वजह से एक-एक करके टूट रही हैं, और मेरा दिल कभी भी फेफड़ों से टूट कर खाली पेट के किसी कोने में पड़ा पड़ा धड़क रहा होगा |

मैं जोर-जोर से साँसे ले रहा था, हर आती हुई सांस के साथ मेरा नाक छिलता जा रहा था | तभी मैं बूँद –बूँद टपकते उसी नल को पकड़ कर उठ गया और जबकि मुझे किराये के उस कमरे का दरवाज़ा खोल कर डॉक्टर के पास चले जाना चाहिए, मैं सीड़ियों पर चढ़ता हुआ छत पर चल गया और वहाँ पड़े एक टूटे हुए पलंग पर लेट गया और अगर आप इस “लेट” गया को गिर गया समझेंगे तो ज्यादा मेहरबानी होगी |

दोपहर की उस धुप में औंधे मुँह लेटने का...नहीं, पड़ जाने का जो सुख है, वो 4 महीने पहले कॉलेज ख़त्म करके अपने दोस्तों के साथ गोवा में मस्ती करते हुए उन गौरी लड़कियों को धुप सेंकते हुए देखने से ज्यादा वाला सूख था | मैं तीन रातों से लगातार सोया नहीं हूँ इसलिए मुझे लग रहा है की जैसे मेरे सिर का पिछला हिस्सा दर्द के मारे थोड़ी देर में ही फट जाएगा और हो सकता हैं कि सिर का फटना भी दिपावली पर “बन्दर छाप”  सूतली बम फटने की तरह आवाज़ करता हो |

और हो सकता है कि इस आवाज़ को सुनकर पास वाली छत पर पतंग उड़ाने की नाकाम कोशिश करता हुआ एक बच्चा और उससे थोड़ी दूर पानी की टंकी पर बैठी हुई वो लड़की मेरी और देखने लग जाएँ | और मुझे ये समझ नहीं आ रहा है कि उस बच्चे के हाथ में ठिठुरती हुई वो पतंग चान्दबाज़ (ऐसी पतंग जिस पर गोल चाँद बना हो ) होने की वजह से खुबसूरत लग रही है या वो लड़की खुबसूरत होने की वजह से चान्दबाज़ लग रही है |

वो लड़की किताब हाथ में लेकर किसी दूसरी छत की और देख रही है | एक जोरदार आवाज़ आई तभी किताब में मुँह धसाई उस लड़की ने पीछे पलट कर मेरी और देखा | और मुझे लगा कि सच में मेरा सिर फट गया होगा और तभी मेने अपना सिर सम्भाला, वो फटा नहीं था | आवाज़ पलंग के टूटने और मेरे ज़मीन पर गिरने की थी | मैनें गिर जाने के बाद अपना सिर संभालने के अलावा और कोई प्रयास नहीं किया जो की यदि में बीमार नहीं होता और ऐसे ही किसी पलंग से गिर गया होता और यदि ऐसी ही कोई लड़की मेरी और देख रही होती तो अब तक मैं फर्स्ट इम्प्रैशन खराब होने के गम में दस बार सिर ठोंक चूका होता |

वो लड़की उसकी छत और मेरे मकान मालिक की छत को जोड़ने वाली दिवार के पास आकर खड़ी हो गई | अब आप ये न सोचे की मैं उसकी खुबसूरती के कसीदे पढ़ने लग जाऊंगा कि वो व्हाईट सलवार और ब्लू टी-शर्ट में बहुत खुबसूरत लग रही है की उसने अपने हाथो में वैसे ही शेड्स वाली नेल-पोलिश लगा रखी है जैसी मेरे कॉलेज में मेरे साथ पड़ने वाली एक लड़की ने लगा रखी थी और जबकि नेल पोलिश को सिर्फ देखना होता है मैनें उसकी उँगलियों को हाथों में लेकर नेल पोलिश को छुआ और महसुस किया था उसकी उँगलियाँ कपास के फूल पर लगी हुयी रूई की तरह इतनी तो सफ़ेद थी की जब मैनें उन्हें छूकर छोड़ा तो वो लाल हो गई |   

खैर... मैं यह कह रहा था कि मैं इस छत वाली लड़की की खुबसूरती बयान करने में जरा सा भी टाइम वेस्ट नहीं करूँगा | बस इतना समझ लीजिये की वो इतनी ही खुबसूरत थी जितना इस तरह की किसी घटना में किसी अकेली लड़की को खुबसूरत होना चाहिए या होने का हक़ होता है |
उसने मुझसे कहा कि “क्या हुआ तुम्हें ?” और उसके सुर्ख होठों से निकले इस खुबसूरत सवाल का कोई बीमारों वाला जवाब देना था या उसे बता देना था कि मैं पिछली तीन रातों से सोया नहीं हूँ, और इसकी वजह कोई टिपिकल प्रेमिका नहीं है कि जिसके साथ रोज रात को 12 से 6 तक ऐसी बातें करना जरुरी हो कि जिनमें गली के आवारा कुत्तों से लेकर सलमान के कुँवारे जुत्तों तक का सारा ब्यौरा उपलब्ध हो |

बल्कि इसकी वजह ये है कि मुझे सॉफ्टवेर इंजीनियरिंग की जॉब में ख़ुशी नहीं मिल पा रही है | भले ही कुछ हज़ार की गड्डियों से खुबसूरत कारें, फ्लेट्स और उतनी ही खुबसूरत बीवियों को पा लेने (या चाहे तो खरीद लेने) की औकात आ जाये पर अपने काम के साथ मिलने वाली संतुष्टियों को पाने में नाकामी हाथ आ रही है | मुझे फ़िल्में बनानी है पर यहाँ मजबूरन पैसे कमाने के लिए मैं झक्ख मार रहा हूँ | और इसी टेंशन की वजह से बीमार हो गया हूँ |

खैर... उसके “क्या हुआ तुम्हें” पूंछने के बाद मैंने कोई जवाब नहीं दिया और बेहोश हो गया | और जब आप ये समझ रहे होंगे कि छत पर मेरी आँखें बंद होने के बाद सीधे हॉस्पिटल में खुलेंगी और वो लड़की रात भर मेरी केयर करते हुए मेरे सिरहाने के पास रखी हुई कुर्सी पर बैठी-बैठी सो चुकी होगी तो ये बता देना मेरा फ़र्ज़ है की मैं अस्पताल में सारी रात अकेला ही था l

Sunday, April 13, 2014

माताएँ नहीं करती बलात्कार...



yourlifeandme.wordpress.com से साभार


भारत तुम माता नहीं, मर्द हो,

बलात्कारी हो,

क्योंकि माताएँ नहीं करती बलात्कार,

उन छोटी बच्चियों के साथ,

जिनकी फ्राकों पर बने हो 

मून, मछली, मोती, तितली 

और ट्विंकल ट्विंकल लिटिल स्टार |

माताएँ नहीं करती बलात्कार,

चलती बसों में उन लड़कियों के साथ,

जिनके शरीरों पर छातियों और जांघों के आलावा,

दो आँखे भी हो, दो पलके भी,

जिनसे झुलते हो सपने रेशम से चार |

माताएँ नहीं डालती अपनी कमतरी को छुपाने,

उन नितांत निजी स्थलों में,

लोहे की राडें, किले और जलती सिगरेटें,

जिनसे होकर दुनियां में आते है,

तुम्हारे पवित्र ईसा, मोहम्मद और राम निर्विकार |

माताएँ नहीं करती बलात्कार,

गाँव की उन दलित महिलाओं के साथ,

जिनके हाथों में होती है आटे की खुश्बू,

एड़ियों की दरारों में धंसे सुखे खेत,

ऑखों में काजल सा पसरा सन्नाटा

और आँचल से बहती दूध की धार |

क्योंकि भारत तुम मर्द हो,

माता नहीं |

Saturday, March 8, 2014

पोलिटिकल फ्यूज़न...



ये दौर है फुल टू कन्फ्यूज़न का,

ये ठेठ पोलिटिकल फ्यूज़न का |

कोई सुनाये पापा दादी की कहानी,

किसी ने छाती छप्पन इंच की तानी |

कोई ले आये झाड़ू, मचाये इंट्री फाड़ू,

आठ का जुगाड़ू और बत्तीस का बिगाड़ू |

जब समझ नी आये कि क्या है करना,

तो उठाओ टोपी और बिठा दो धरना |

नहीं चाहिए गाड़ी नहीं चाहिए बंगला,

नाचना तो जानू बस टेढ़ा है अंगना |

मेरी हो बन्दूक आमजन के कंधे,

कोयले की खान में सफ़ेद टोपी के बन्दे |

जब तुमको भी सताए फिकर देश महान की,

चले जाना गर्लफ्रेंड संग पिक्चर सलमान की |