Friday, November 11, 2011

Ra.One: एक भागीरथी तमाशा



शाहरुख़ खान की महत्वकांक्षी फ़िल्म रा.वन भले ही कथित रूप से हिट हो गयी है पर अगर बॉलीवुड का बादशाह अपने चमचे-चपाटियों से अलग हो कर एकांत में कुछ देर चिंतन करे तो उसे अपने कथित होलीवुडीय तमाशे में चीत्कार करते कमजोर कहानी और निर्देशन पर अफ़सोस होगा.
हक़ीकत तो यह है की शाहरुख़ ने करोड़ो को कोड़ी की तरह खर्च करके एक ऐसी फ़िल्म रची है जिसके पास तकनीकी रूपी शरीर तो है पर कहानी रूपी आत्मा डालना भूल गए है. शाहरुख़ खान ने भले ही परंपरागत करवा चौथ से लेकर हल्क़े संवादों तक के सारे मसाले नींबू निचोड़कर परोस दिए हो पर वो ये समझ नहीं रहे या समझने की कोशिश नहीं कर रहे है की दर्शक का स्वाद अब बदल गया है. अब आप उसे "बड़े-बड़े देशो में छोटी-छोटी बातो" के महामंत्र पढ़कर बांधे नहीं रह सकते है.

शाहरुख़ ने भले ही बच्चों को टार्गेट रख कर फ़िल्म बनाने का दंभ भरा हो पर एक सीन में बच्चे के मुह से 'कंडोम-कंडोम' बुलवाना कोन-सा मनोरंजन है ये वो ही जाने.

शाहरुख़ हर अवार्ड फंक्शन में आपको दिख जाएंगे. जैसे गाँव में मंदिर के ओटले पर पल्ली बिछाकर, चार लोग मिल कर ताश के पत्ते फेटने का आयोजन कर लेते है वैसे ही आजकल हर चार दिन में एक छिटपुटिये अवार्ड फंक्शन का आयोजन होता रहता है. ऐसे फंक्शनों में वो उतने ही कॉमन मिलते है जितने सब्जी के ठेले पर आलू. वे अपने बाजारीकरण का कोई मौका नहीं चूकते.

हकीकत में शाहरुख़ खान अब वो 20 साल पुराना 'राजू' नहीं रहे जो दिल्ली से मुंबई 'जेंटलमेन’ बनने आया था. अब वो बाजार का ब्रांड बन गए है, उसका भगवान बन गए है. वे टूथपेस्ट से लेकर कार तक सब बेचते है. अब एक्टिंग उनकी इतनी पर्सनल वस्तु नहीं रह गई है, वे इसका प्रोफेशनल बनकर उपभोग कर रहे है - अपने कथित 'किंग' डम को बचाने के लिए.

शाहरुख़ खान ने अपनी प्रतिभा को कुछ चमचा छाप डायरेक्टरों तक सीमित रख दिया है. एक बार फिर उन्हें अपनी सबसे सुन्दर फिल्म 'चक दे इंडिया' को देखना चाहिए. देखना चाहिए की जब शाहरुख़ अपना 'शाहरुखत्व' छोड़ते है तो कितने सुन्दर लगते है.

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E- magzine दखलंदाजी http://www.dakhalandazi.com/2011/11/raone.html पर प्रकाशित 

Sunday, November 6, 2011

पेट्रोल ब्रेकअप्स लव !



पेट्रोल के दाम एक बार फिर बढ़ जाने के बाद आप सोच रहे होंगे की मैं आम आदमी की तकलीफों के बारे में प्रवचन पिलाऊंगा,पर ऐसा नहीं है. आम आदमी जाए भाड़ में. आम आदमी आजकल इतना 'आम' हो गया है की उसके बारे में बात करना मुझे पसंद नहीं है. मैं तो आम आदमी से परे एक 'खास' पालतू और फालतू प्रजाति के बारे में बात करूँगा और वो प्रजाति है प्रेमियों की.

मैं उन आशिक मिजाज लड़को को लेकर परेशान हूँ जिनकी मोटर साइकलें यदि सुबह सुबह सात स्कूटियों का पीछा न करे तो उनकी आँखें न खुले. मैं उन प्रेमियों के लिए परेशान हूँ जिनकी प्रेमिकाएं उनसे ज्यादा उनकी मोटर साइकलों से प्यार करती है. कभी कभी तो मुझे लगता है की कुछ लड़कियां प्रेमी नाम की दो -चार स्टेपनियाँ साइड मैं इसलिए पटक कर चलती होंगी की ये वाला बंदा मोबाईल में रिचार्ज वाउचर के लिए और वो वाला बाइक पर घुमाने के लिए.

अब अगर पेट्रोल के दाम दिन-ब-दिन ऐसे ही बढ़ने लगे तो इस तरह जो पेट्रोल आधारित प्रेम की सामाजिकता बरक़रार है उसकी साख को तो नुक्सान ही पहुँचेगा ना.

मेने अपने दोस्त से जब इस बारे में बात की तो उसने कहा कि अमेरिका के वेनेजुएला में तो पेट्रोल के दाम 75 पैसे/ली. है. यह सुनकर मुझे बड़ा अच्छा लगा और सारे प्रेमी समाज की और से मैं सरकार से गुजारिश करता हूँ की वो इस तरह की व्यवस्था करे की जैसे काम करने के लिए विदेशों में वीज़ा मिलता है उसी तरह प्रेमियों को प्रेम करने के लिए वीज़ा उपलब्ध हों ताकि वो वहाँ अपनी प्रमिकाओं को बाइक पर बैठा कर घुमा सके. पेट्रोल आधारित प्रेम बड़ा सके क्योकि भारत में जिस तरह पेट्रोल के दाम बढ़ रहे उससे मुझे नहीं लगता की यहाँ 'प्यार' में इतना दम बचेगा की वो बिना पेट्रोल के सहयोग के अपनी 'रिलेशनशिप' बचा लें.
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E- magzine दखलंदाजी http://www.dakhalandazi.com/2011/11/petrol-breakups-love.html पर प्रकाशित |

Sunday, October 30, 2011

सूखे चुम्बन और दो कश


हम उस मनहूस वक़्त में रहते थे,जहाँ सपने नहीं देखे जा सकते थे | क्योंकी ऐसा कहा जाता है की सपने देखने के लिए आँखें बंद करना पड़ती है और हम चाह कर भी अपनी आँखें बंद नहीं कर सकते थे| क्योंकि हमारी पलके उनसे निकलने वाले काले आंसुओं में बह गयी थी | हर बितते हुए पल के साथ यथार्थ हमारी छाती में खंजर बनकर गढ़ता जाता था |  उससे बचने के लिए हम मीठे सपने देखना चाहते थे और इस तरह हम खुली आँख ही सपना देखने लग गए | जब हम खेतों में उगी हुई सुखी जमीन पर चलते थे तो हमारी एडियों की दरारों में जमीने धँस जाती थी | चूँकि हमे खुली आँख ही सपने देखने की आदत पढ़ गयी थी इसलिए हमें लगता था की हम स्वर्ग में मखमलों पर चल रहे हैं | मखमल जो हमें इतने मुलायम लगते थे की हम उन्ही पर लेट जाना चाहते थे | क्योंकी इतनी कोमलता हमारी बीवियों की सुखी हुई चमड़ियों में नहीं बची थी | हम हमारी बीवियों से प्यार करना चाहते थे पर उनके होंठ पत्तों की तरह सुख गए थे | ऐसे पत्तें जिनमे तंबाकु भर दिए जाने के बाद हम उनसे कम से कम दो कश खींच सकते थे जो दो चुम्बन की तरह ही सुखद होते और वो भी अपनी अश्लीलता खोये बगैर |
जब हम सूखे हुए पेड़ों को देखते थे तो उन्हें बाहों में भरकर चुमते थे | क्योंकि वो स्वप्न में हमें स्वर्ग की अप्सराएँ लगती थी |हम उनके पेरों में पगड़ियाँ रखकर सुख की भीख माँगते थे |
हम रोते हुए पत्थरों पर नंगे होकर कूद जाते थे | क्योंकी हमें स्वप्न में लगता था की यहाँ अब भी नदी बह रही होगी पर अफ़सोस की हमारी चमड़ियों के टुकड़े हमारे शरीरों से टूट कर पत्थरों पर चिपक जाते थे  | और हम अपनी आँखें बंद कर लेते थे | हमारे गाल शर्म के मारे लाल हो जाते थे |क्योंकी हमें लगता था की हम अब नंगे हो गए हैं |
ठण्ड से बचने के लिए हम अपना सर मिट्टी के चूल्हों में धँसा लेते थे तो वहां पड़ी राख में हमें अब भी गर्माहट का अनुभव होता और दो चुटकी नमक (आटे में) डालकर बनायीं गयी गर्म रोटियों की खुश्बू का भी |
हम सब उस राख को खाने के लिए लड़ते थे लड़ना अब हमें प्यार करने जितना ही अच्छा लगने लग गया था | किसीको जान से मार देना हमें सच्चे प्यार करने जितना ही सुखद दिखता था | हमारे बच्चें हमारी बगलों में छुपकर बैठे रहते थे | वो हमें प्यार करना चाहते थे और हम उन्हें खा जाना | हम सब एक हसीन मोत के साथ सो जाना चाहते थे पर हमें श्राप लगा था |
दुःख हमें इतना तो मीठा लगने लग गया था की सुबह- शाम हम उसमे उंगलियाँ  डुबों कर डबल रोटी की तरह खा लेते थे |
उस अभिशाप से पहले हम खुश थे, हम हमारी बीवियों के पेरों में मेहँदी लगाते थे, उन्हें साड़ियाँ पहनाते थे,उनके माथे पर चुम्बन और बिंदियाँ चिपकाते थे | हम अपने बच्चों को चड्डीयाँ पहनाते थे और चूँ-चूँ कर बजने वाले जूते भी| हम उन्हें मेलों में रिमोट वाली कार दिलाते थे | बगीचों में झुला झुलाते थे |
सब कुछ कितना सुखद था उस अमरता के अभिशाप से पहले |
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 E- magzine  दखलंदाजी http://www.dakhalandazi.com/2011/10/storypankaj.html पर प्रकाशित |
Photo source: www.deviantart.com

Wednesday, October 26, 2011

दसवीं वालों का जवान होता शहर


सारी दुनिया उज्जैन के मंदिरों की दीवानी है और उज्जैन इसके शौपिंग मॉल्स का | उज्जैन दो भागो में बँटा है-पुराना शहर और नया शहर| पुराने शहर में पुराने हो चुके देवता और मंदिर रहते है तथा नए शहर में अभी-अभी जवान हुए मॉल्स,बिल्डिंग्स और खुबसूरत लोग | दुनिया पुराना शहर घुमने जाती है और पुराना शहर नया शहर घूरने सॉरी... घुमने जाता है |

यही बात हम स्टुडेंट्स पर भी लागु  होती है और वो भी पूरी शिद्दत के साथ | पुराने शहर वाले लडको की दाढ़ी और मुच्छों पर जैसे ही बाल  आना शुरू होते है वे नए शहर की और कूच कर जाते है | अगर दसवी के बाद आपने साइंस लिया है तो आप यहाँ शाहरुख़ खान है आपकी "मन्नत" नए शहर में कुकुरमुत्तों की तरह उगें कोचिंग क्लासेस है |और यदि आर्ट्स या कॉमर्स लिया है तो आप यहाँ सिर्फ "डिनो मोरिया" बन के रह जाते है| आप सिर्फ मार्कशीटों पर ही स्टुडेंट्स कहलाते है,लोगो की नज़रो में आप अफगानिस्तान वासियों की तरह दयनीय प्राणी बन के रह जाते है...साला पुराना शहर विकासशील भूटान और नया शहर विकसित अमरीका सा लगने लगता है| नए शहर को लोग 'फ्री गंज एरिया' कहते है क्योकि फ्री गंज नए शहर की शुरुआत करने वाला क्षेत्र है | आप इसके नाम पर मत जाइए क्योकि यहाँ चीज़ें उतनी ही महंगी है जितना इसके नाम में सस्ते  पन  का एहसास |

नए शहर और पुराने शहर को जोड़ने वाला सिर्फ एक ही ब्रिज है| ओफ़िशिअल नाम मूर्धन्य पत्रकार ठा.शिव प्रताप सिंह  ब्रिज और मुह्बोला नाम 'फ्रीगंज का पूल' | 'फ्रीगंज का पूल' किंगफिशर  की 'फ्लाईट' लगने लगता है की चढ़ते ही नए शहर में 'लैंड' करवा देगा | इस पूल पर एडवरटाइस बड़े बड़े होर्डिंग्स और फ्लेक्स के रूप में लगे रहते है | (कुछ दिन पहले ) पूल से उतरते ही एक नयी बनने वाली सिटी(कॉलोनी ) का एड लगा था जिसमे  सुविधाएँ  दर्शाने के लिए पार्क, मंदिर और हॉस्पिटल के साथ स्विमिंग पूल का भी फोटो था | स्विमिंग पूल में एक लड़की खड़ी थी, जाहिर सी बात है की लड़की ने स्विमिंग पूल में सलवार सूट नहीं पहना होगा| उस लड़की की फोटो को खरोंच दिया गया | पता नहीं किसने खरोंचा -नगर निगम ,एड कम्पनी  या  धर्म रक्षक| निगम को 'सेवा' से फुर्सत नहीं है ,एड कम्पनी को बिजनेस से तो फिर आप समझ ही गए होंगे की नहाती हुई लड़की किसकी दुश्मन रही होगी |

खैर...अच्छा ही किया...जिस पुराने शहर के लड़के 'टी -शर्ट' वाली लडकियों को देखने के लिए पगलायें जाते है वो यदि स्विमिंग पूल में खड़ी लड़की की फोटो को देखते हुए ब्रिज पार करते तो फ़ोकट में एक्सीडेंट 'कर-कुरा' के' मर-मुरा' नहीं जाते |

 दुश्मन से याद आया की  आप वेलेंटाइन डे  के दिन अपनी बहनों को बाइक पर बिठा कर कॉलेज नहीं छोड़ सकते है क्योकि ये उज्जैन के धर्म रक्षको के सविधान के खिलाफ है | धर्म रक्षक युवको का समूह दिन भर प्रेम में आकंठ डूबे लड़के-लडकियों को पीटने के बाद शाम को गम में डूब जाता है| ना...ना प्रायश्चित करने के लिए नहीं बल्कि इस बात को लेकर की दिनभर लंगूर जैसे लोगो की अंगूर जैसी गर्ल फ्रेंड देखने को मिलती है और हम यहाँ साला मंदिर का घंटा बजाते रह जाते है |

कभी कभी आपको IIT की एंट्रेस परीक्षा में सफलता दिलवाने के दावे करते हुए (टाई लगाकर हाथ बाँधे हुए) टीचर्स भी एड में दिख जायेंगे,ये अलग बात है की उन्होंने बी.एस.सी  भी हांफते  हुए निकली हो|

एक बार पूल की दीवारों पर एक नीला हाथी बना हुआ दिखाई  दिया नीचे लिखा था बहन मायावती के सानिध्य में ब्ला ब्ला ...जब में पूल से गुजरा तो हाथी रोते हुए बोला की आपके यहाँ लोगो को 'कमल के  फूल' और 'हाथ के पंजो' से ही फुर्सत नहीं है ...मैने उसकी बातो को सुना-अनसुना  कर दिया| अगले दिन फिर जब मैं पूल से गुजरा तो देखता हूँ की हाथी सिकुढ़ गया है और उस पर उछलती हुई  कटरीना कैफ का शान से चिपकाया हुआ फोटो  लगा है  और लिखा हुआ है :- सुपर हिट- शीला की जवानी |

पूल के ख़त्म होते ही 'घंटा घर' चौराहा आ जाता है,आस-पास कई चाट के ठेले लगे रहते है इसे 'चौपाटी' कहते है चौपाटी पर पनपने वाली प्रेम कहानियो के बारे में बाद में  बात करेंगे...पहले ये की दसवीं पास करते ही स्टुडेंट्स नए शहर में घुसपेठियों  की तरह घुस जाते है | दसवी तक भले ही नाक पोछनें की फुर्सत ना हो पर नए शहर की कोचिंगो में जाते ही आदमी में एक स्टेंडर्ड आ जाता है -ऐसा लोग कहते है|

और ये देखकर तो साला ख़ुशी के मारे मर जाने का मन करने लगता है की छुटा हुआ कोर्स पूरा करवाने के लिए असिस्टेंट लड़कियां आपके पास बैठ कर पढ़ाती है| इतनी ख़ुशी तो मुझे तब भी नहीं हुई थी जब २००४ में दिग्विजय सिंह के दस सालो के (कु या सु ?) शासन का अंत हो गया था और विधानसभा (म. प्र.) का चुनाव जीत कर उमा भारती मुख्या मंत्री बन गयी थी | और ख़ुशी इस लिए हुई थी क्योंकि  मैं गाँव में रहता था इस लिए मुझे लगता था की अब इलेक्ट्रीसिटी कभी नहीं जाएगी पर ऐसा नहीं हुआ | उलटे उमा भारती चली गई -बी.जे.पी और कुर्सी दोनों छोड़  कर|

खैर अब कोचिंग पढ़ाने वालो की  खाल उधेड़ लेते है | फिजिक्स पढ़ाते टीचर इतना तो डबल मीनिंग भाषा में पढ़ाते है की आप सोचने लग जाते है की यहाँ फिजिक्स के सर्किट पढ़ रहे है या दादा कोंडके की फिल्म देख रहे है - अँधेरी रात में दिया तेरे हाथ में |
कई तरह के टीचर अपने पास कई तरह के फीचर होने का दंभ भरते है -
कोड्स, शोर्ट ट्रिक्स ,मंत्रास
पर होता है साला सब फालतू बेमतलब बकवास|
पुराने शहर का लड़का नयी कोचिंग पर आकर ये नहीं पूछता की फिजिक्स,केमेस्ट्री और मेथ्स की बुक के राइटर का नाम क्या है  बल्कि वो ये जानना चाहता है की काले सलवार सूट पहने लड़की का नाम क्या है ? जो स्कूटी पर आती है उसका बॉय फ्रेंड भी है या नहीं ...सबसे ज्यादा रिक्वायरमेंट खुले बालो और जींस टी -शर्ट अटकाएं लड़कियों की होती है | लड़के सबसे पहले नए शहर की खुली फ़िजाओ में प्यार में पड़ जाना चाहते है | किसी लड़की को लेकर चौपाटी ,के.डी. पैलेस या इस्कान मंदिर ले जाना चाहते है | पुराने शहर  के सारे मंदिर और देवता नए शहर के इस्कॉन मंदिर की और जाते प्रेमी जोड़े को देख कर उदास हो जाते है | आप तो जानते ही है इस्कॉन: अमीरों का भगवान | इस्कॉन का पुराने शहर वालो के बीच एक स्टेटस है|

जब इस्कॉन के रेस्तरां में प्रेमी और प्रेमिका आँखों में आँखें डालकर समोसा या केक खाते होंगे तो उस स्टेंडर्ड युक्त  मॉर्डन भक्ति योग के वातावरण में प्रेम वैसे ही बढता होगा जैसे पुराने शहर वालो की नए शहर के स्टेटस में रहने की भूख|
(मैं किसी राजनैतिक पार्टी का समर्थक नहीं हूँ | लेख में पार्टियों के नाम सिर्फ राजनैतिक प्रभाव दर्शाने के लिए प्रयुक्त किये है )
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दीपावली पर लॉन्च हुई E-magzine नजरिया पर  जवान होता शहर के नाम से प्रकाशित 

Friday, September 16, 2011

होठों के टुकड़े


गोल गप्पे खाऊंगा जब चौपाटी पर

अपनी गर्ल फ्रेंड के साथ,

फूटेगा एक बम

और ढूंढ लेना होगा

टूटी हड्डियों और झूटी प्लेटो के बीच

मुझे अपना हाथ |

धमाकों के बाद सोयी लाशों के खून को

सुबह की चाय में घोल कर,

नेता डुबो कर खा रहे है

बयानों के बिस्किट |


और दूसरी और एक बीवी है

जो ढूंढ़ रही हे

अपने पति के होठों के टुकड़े,

ताकि उन्हें चूम कर बता सके

की शादी के दस साल बाद भी करती है प्यार |

भले ही उसने कभी ना भेजें हों

आइडिया के तीस रूपये वाले मैसेज पैक से

आई लव यु भरें मैसेज |
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(image -zazzle.com)

Wednesday, August 31, 2011

बॉडीगार्ड:एक प्रेम-कथा


 सलमान खान की फिल्मो में अधिकतर सलमान ही छाए रहते है| उनकी अकड़ू स्टाइल,डायलाग बाजी हर फिल्म की यु.एस.पी. होता है| पर इस फिल्म में सलमान बॉडीगार्ड होते हुए भी अपने नाम की तरह 'लवली' दिखे| कठोर शरीर के पीछे मासूमियत बरकरार रखते दिखे| सलमान की एक्टिंग कुछ-कुछ उनकी पुरानी फिल्म 'बंधन' की तरह थी| वे उसी अंदाज में 'जी मालिक!'  करते दिखे| फिल्म शुरू होकर इंटरवल तक आते-आते  अपने आप को बरकरार रखने के लिए जददों-जेहद करती हुई दिखी| इंटरवल तक की पटकथा कमजोर है,इसके बाद फिल्म पटरी पर लोटती दिखाई देती है| फिल्म के आखरी 20-25 मिनिट आप मिस नहीं करना चाहेंगे| फिल्म की जान उसका आखिरी सस्पेंस है,यदि फिल्म का अंत वो नहीं होता जो हुआ तो फिल्म 'तेरे नाम' जेसी एक त्रासद प्रेम-कथा हो होकती थी| फिल्म में एक्शन सीन के साथ प्रयोग साऊथ की फिल्मो की तरह रजनीकान्तमयी एवं शानदार है| आखरी के एक्शन सीन्स को खत्म करने के लिए डायरेक्टर साहब जल्दी में दिखे| आप कुछ समझ पायें उससे पहले शर्ट लेस सलमान विलन को खुटी पर टांग देते है| फिल्म स्क्रिप्ट के लिए गुन्जायिश साफ़-साफ़ देख सकते है|आदित्य पंचोली अपने रोद्र रूप में जमते है असरानी सरीखे हास्य-अभिनेता का फिल्म में कोई उपयोग नहीं है| महेश माँजरेकर सलमान के साथ वेसे ही 'फ्री' में मिलने लगे है जेसे गोविंदा के साथ कादर खान| करीना कपूर की  खूबसुरती पूरी फिल्म में झलकती रहती है| एक कश्म-कश में डूबी लड़की का रोल बड़ी खूबसुरती से निभा जाती है| फिल्म के रद्दी टाइटल सॉन्ग के बाद 'तेरी मेरी प्रेम कहानी' सॉन्ग हिमेश की लाज रख लेता है| लेकिन इस गीत का श्रेय श्रेया घोषाल और राहत साहब को मिलना लाजमी  है कुल मिला कर इंटरवल तक ये फिल्म स्लो है और कॉमेडी की जगह एक्शन से परी-पूर्ण एक  लव स्टोरी है| खैर...इस फिल्म मे सलमान अपनी पुरानी फिल्मो की तुलना में थोडा अलग दिखे है|
  



Tuesday, June 28, 2011

फेसबुक की नीली दीवारों से

फेसबुक की नीली दीवारों  से,
जब उसके काले  आंसू  रिसते  है .
मै उन्हें  लाइक  करते जाता हूँ,
कमबख्त पोछने  से पहले.



Monday, June 20, 2011

मुन्नी,शीला और सत्यानाश !


  मुन्नी, शीला और रजिया के बाद अब शालू ठुमके लगाने लग गयी है, समझ नहीं आता की गीतकारों और संगीतकारों के भेंजे कहाँ तैल लेने चले गए है,हिट सॉन्ग बनाने की चाह में  आजकल लड़कियों के नाम भी गानों में शुरू हो गए है...खैर इसका सिलसिला तो "मोनिका.. ओह माय डार्लिंग" से भी पहले से शुरू हो गया होगा पर उन पुराने गानों में एक सलीका था, एक राहत थी, एक नजाकत थी,लेकिन आजकल ...
                                                        ऐसा भी नहीं है की गानों में सिर्फ लड़कियों के ही  नाम इस्तेमाल हो रहे है,
लड़को  के भी हो रहे है पर आप ज्यादा से ज्यादा क्या कहेंगे- "पप्पू  कांट डांस" या "टिंकू जिया" इसके आलावा "टिंकू बदनाम हुआ" या  "पप्पू जवान हुआ" सुनकर हमारे दिलो में कोई हलचल पैदा नहीं होगी, हलचल पैदा करनी हो तो लड़कियों के नाम उठाओ.
                                              एक बार मुन्नी ऐसी बदनाम हुई की खुद तो दौलत और शोहरत कमाकर ले गयी पर पीछे छोड़ गयीं हज़ारो मुनियाँ  और शिलाएं बदनाम होने के लिए-अपने गली मोहल्लों में. खबर आई थी की एक आदमी ने एक लड़के का खून इसलिए कर दिया क्यूंकि उसकी लड़की का नाम शीला था और उस लड़के ने उस लड़की को चिढ़ा-चिढ़ा कर उसका जीना हरम कर दिया,चिढाने के लिए कौन-सा गाना युस करता था बताने की जरूरत नहीं है -आप समझ ही गए होंगे.
                                                           एक और गाना आया 'मटन' समझ नहीं आया की यहाँ फेरी वालो की तरह चिल्ला - चिल्ला  कर शारीरिक 'खूबियाँ'  बताने  की क्या जरूरत थी? और वेसें भी युवतियाँ कितनी भी आधुनिक क्यों न हो गयी हो, पर उनमे इतना तो आकर्षण तो बच ही गया है की अपने आपको मटन के साथ 'कम्पैर' करके सड़को पर फेरी लगाने की जरुरत नहीं है. 
                                                                      एक और गीत  "दम मारो दम"  में गीतकार ने इसके पुराने  वर्जन में ऐसा लकवा मार दिया की सारी शालीनता दीपिका की स्कर्ट की तरह तुच्छ हो गयी.अल्प वस्त्र धारिणी दीपिका जब उछलते- कूदते  "हरे कृष्णा-हरे राम ' गाती होंगी तो राम जी तो आखे ही बंद कर लेते होंगे, कृष्णा का पता नहीं है शायद रो लेते होंगे की इस गोपी ( दीपिका)  के पास से चुराने के लिए 'कुछ' भी नहीं बचा.
खैर ...गीतकारो और संगीतकारों को अपनी माँ और बहनों के नाम गानों में इस्तेमाल करने चाहिए और ज्यादा 'रियल' लगेंगे जेसे कटरीना का 'शीला' बनकर  इतराना रियल लगता है .
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(image-jokesprank.com)

Sunday, April 17, 2011

उस पगली का प्रेम निवेदन


मैंने जैसे की पहले भी कहा था की मैं न जाने क्यों उन लोगो को सोचने में अपना वक्त बर्बाद कर देता हूँ, जो भूल कर भी मेरे बारे में नहीं सोचते होंगे .
                                                    मैं सोचता हूँ उस लड़की के बारे में जो मेरे मामाजी के पड़ोस में रहने वाले लड़के की शादी में मेहमान बनकर आई थी.मैं आठवी में होऊंगा जब उस लड़की ने मुझसे मिलने के तीन-चार घंटो बाद ही मेरे पेरों में एक चुलबुलाहट भरी गुदगुदी  की ,जो ये बताने के लिए काफी थी की वो दसवी में पढ़ती थी.और उसकी इस परिपक्व हरकत के बाद मैं अन्ताक्षरी का वो खेल छोड़कर भाग गया जिसमे हरने वाली टीम को "चूड़ियाँ " पहनाने का रिवाज था.उसे शायद मेरी शक्ल पसंद  थी पर मेरा बचपन नहीं.वो मुझे जल्दी से बड़े होते देखना चाहती थी .उसका बस चलता तो वो 'कोम्प्लैन'  या  'बोर्नविटा' टाईप   के हजारो डिब्बे  उस एक रात में पिलाकर मुझे बच्चे से बड़ा बना देती जिसकी अगली सुबह उसने मुझे "आई लव यू " कह दिया था.और इसके बाद में  दोड़कर  पीछे वाले कमरे में  दरवाजा  लगाकर  छुप गया था. शायद उसे  मेरा जवाब उस बंद दरवाजे पर  टंगे हुए ताले  की झूलती हुयी चाबी ने दे दिया था .
                                                                               उस पगली के इस अजीब से प्रेम निवेदन के  आठ साल  बाद फिर में अपने मामाजी के पड़ोस में रहने वाली  लड़की की शादी में गया , फिर वो पगली लड़की मुझे दिखी,
इस बार मैंने उसे एक 'स्माइल'  दी. वो लड़की मुस्कुराकर शर्माते हुए अपने कमरे में चली गयी .जाने से पहले  उसने अपने दोनों बच्चो को गोद में उठा लिया था.
                                                                        मैंने देखा की उसके कमरे का दरवाजा  आधा खुला हुआ है,जिस पर एक  ताला लटक रहा है , उस ताले में एक चाबी लगी है  जो अभी तक झूल रही है .
         (यह वास्तविकताओ पर आधरित एक कल्पनिक घटना है )
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image-hindustantimes.com
 

मैं छत पर टहलता हूँ अपनी

मैं छत पर टहलता हूँ अपनी 
तब भी 
जब लिम्बूं के आचार की बरनी 
माथे पर कपड़ा बांधे  
धुप में 
बेठी नहीं रहती, 
तब भी 
जब वो  लड़की उसकी छत पर
किताबो की आढ़ से
किसी को देखा नहीं करती,
तब भी 
जब तुलसी के पौधे 
और  अटारियों  के बीच
पिद्दी  सी मकड़ी 
जिद्दी से जाले नहीं बुनती,
तब भी  
जब पड़ोस की भाभी 
कपड़ों और गीली इच्छाओं को 
उन रस्सियों पर नहीं सुखाती, 
तब भी 
जब  ताजी सी दुल्हन 
पुरानी छत पर खढी हो 
नए रिश्ते नहीं चुनती, 
तब भी 
जब  उन  ऊँघे हुए रास्तों पर
बेशर्म बाराती, पगलाया दूल्हा 
बेसुरे बाजे, खास्ता जेनरेटर 
और सफेदपोश ट्यूब लायटे
नहीं घुमती



Monday, April 4, 2011

उसका हाथ मांगनें के लिए

मैं  न जाने  इतना  क्यूँ  सोचता  रहता  हूँ . मेरा  दिन  भर उन  लोगो  को  सोचने  में बर्बाद हो जाता है ,जो शायद मेरे बारे में  भूल  कर  भी नहीं  सोचते होंगे.  मैं  आसमान  में उड़ते  उस हवाई जहाज के बारे  में  भी सोचता हूँ ,जिसके  पाइलेट का  अगर बस  चले तो मेरे मुँह पर  ही थूक  दे.
                                                              मै उस लड़के के बारे में भी सोचता हूँ जो मेरे साथ 10 वी में पड़ता था.वो हमेशा एक जैकेट पहने रहता था जिस पर N लिखा होता था लेकिन उसका नाम  R से शुरू होता था.वो हमेशा शराब के नशे में डूबा रहता था.उसकी पढ़ी -लिखी माँ अपना चश्मा साफ़  करते हुए कोचिंग पढ़ाते टीचर के पास आती है,और उस लड़के को समझाइश देने के लिए कहती है. जब टीचर  समझाते हुए, उस नशे में डूबे  बच्चें का हाथ अपने हाथ में लेते है तो वो देखते है की  उसकी आस्तीन के नीचे कलाई से लेकर कोहनी तक एक नाम लिखा है जो शायद उस लड़के ने चाक़ू से अपनी चमड़ी को काट कर लिखा है. ये नाम उस लड़की का पूरा नाम है जिसका पहला अक्षर उसकी जैकेट पर लिखा है .और ये वही लड़की है जो उससे  प्यार नहीं करती क्योंकि वो बदसूरत है.
                                                          मैं उस लड़की के बारे में भी सोचता हूँ ,जो पंडीत जी के घर के पीछे रहती थी. पंडितजी का घर मेरे नाना जी के घर के सामने था. नानाजी का घर उस नदी के पीछे  था, जो गाँव की इकलौती नदी थी,लेकिन अब सुख गयी है. मैं जब भी बचपन में गर्मी की छुट्टियों में वहाँ जाता था तो वो पंडित जी  हमेशा मुझे चिढ़ाते हुएँ मेरा रिश्ता उस लड़की के साथ तय करने की बातें करते थे, वो कहते थे की वो मुझे अपने साथ उस लड़की के घर ले जाकर  उसका हाथ मांगेंगे और मैं  चिढ़ जाता था. वो लड़की मेरी हमउम्र थी और वहाँ रहती थी जहाँ का वर्णन मैंने ऊपर किया है. वो लड़की बहुत हँसती थी अब नहीं हँसती,बहुत बोलती थी अब अब नहीं बोलती. क्योकि  उसके घर के सामने रहने वाले  एक  अमीर किसान के बेटें नें उसके बचपन का बलात्कार कर दिया है. उस लड़की का बाप सिवाय मर जाने के और कुछ ना कर सका. जब मैं इतने सालों बाद वहाँ गया तो मैंने देखा की वो लड़की वहाँ नहीं हैं. काश ! होती तो मैं उन्ही पंडित जी को लेकर उस लड़की के घर चला जाता,उसका हाथ माँगने के लिए.
                                   (यह वास्तविकताओ पर आधरित  कल्पनिक घटनाएँ है )

Saturday, April 2, 2011

वो दिल खाती हैं

झूट कहती हें कुछ लड़किया
की वे शकाहारी हें 
हर दिन सुबह 
नाश्ते में 
एक पागल दिल खाया करती हें 
झूट कहते हें कुछ पति 
की वे अपनी पत्नियों से 
प्यार करते हें 
उनकी पत्नियों की 
औकात 
एक गोल तकिये  से ज्यादा नहीं हें 
जो पड़े रहते थे बगलों में उन दिनों 
जिन दिनों 
कुंवारापन 
बिस्तर की सिलवटे चूमता था 

झूट कहते हें कुछ पागल प्रेमी  
के वे सच्चे प्यार की तलाश में हें 
सच्चा प्यार तब से बेठा हें कही
कोने  में
चार रुपैये की
चूहामार  दवाई खा कर
जब से उसे
पछतावा हुआ हें 
अपने उस एक रात के प्यार पर