Tuesday, August 24, 2021

कहानी - मोक्ष याद नहीं आता उसकी आंखें याद आती है

लड़कियों को नहीं देखने का व्रत लिया था मैंने l उन 5 सालों के दौरान मिली पांच लड़कियों के भी चेहरे याद नहीं आते l 

कभी-कभी तो ऐसा होता था कि कॉलेज में कोई लड़की कहती कि मैं तुम्हारे साथ स्कूल में पढ़ती थी तो लगता था कि स्कूल के दिन किसी और जन्म की बात रहे होंगे l क्योंकि मैंने 15 से 19 की उम्र के बीच साधु बनने की ठानी थी और ब्रह्मचर्य इसकी पहली शर्त था l

मैं सुंदर मोक्ष की कामना करता था पर लड़कियों की सुंदरता से डरना चाहता था l

12वीं शुरू हुई थी l मैं उज्जैन की एक प्रसिद्ध कोचिंग पर मैथ्स पढ़ने गया l छूटा हुआ कोर्स पूरा करवाने के लिए असिस्टेंट लड़कियां पास बैठकर पढ़ाती थी l 

वो उनमें से एक थी l जब वो पढ़ाती थी तो सवाल तो दूर सांस लेना भी याद नहीं रहता था l और अगर गलती से कोई सांस आती भी थी तो इतनी गर्म होती थी कि ब्रह्मचर्य का व्रत पिघल जाता था ,सन्यास की इच्छा पीछे छूटती जाती थी और कभी-कभी तो एक जन्म भी कम पढ़ने लग जाता था l 

पसीने ऐसे छूटते थे कि लगता था कि शिप्रा नदी का उद्गम मेरे ही सिर से हुआ होगा l

फिर कुछ हालात बने और कोचिंग छूट गई, ब्रह्मचर्य बचा रह गया l और साल भर बाद ब्रह्मचर्य और मोक्ष दोनों की इच्छा छूट गई l 

मुक्ति का बंधन टूट गया था, मैं मरना और फिर जन्मना चाहता था l मैं प्यार करना चाहता था l 

और अब ऐसा होता है कि मोक्ष याद नहीं आता उसकी आंखें अब भी याद आती है l

-  पंकज देवड़ा

कहानी - मोक्ष की रात

15 साल की उम्र ऐसी होती है जिसमें लोग किसी और की बाहों में मोक्ष खोजते हैं लेकिन मैं अपना मोक्ष वेदांत की किताबों और साधुओं के गैरवे वस्त्र में खोज रहा था l

मोक्ष पाना मेरे लिए प्रेम पाने से ज्यादा जरूरी था l और इसीलिए मैं अपने गांव में साधुओं को ढूंढता था, उनसे मुक्ति के रहस्य पूछता था l

वो भी एक साधु ही था l सफेद वस्त्र पहने l उस धर्म से वास्ता रखता था जिस की तपस्या और त्याग की मिसाले दी जाती हैं l

वह उसी धर्म के लोगों द्वारा बनाई एक धर्मशाला में रहने आया था l छोटे-छोटे बच्चे उसके पास आकर श्लोक सीखने लगे l मैं भी उसके पास गया l मैंने उससे पूछा की मुक्ति कहां मिलेगी l उसने मुझे सात आसमानों के पार का कोई पता दिया जिसे वह खुद ढूंढने में लगा हुआ था l

उसने मुझसे कहा कि अगर तुम्हें ज्यादा ज्ञान चाहिए तो रात में आना, और भी बच्चे आ रहे हैं l उसकी बात मान कर मैं रात में धर्मशाला में गया l वहां पर उस बूढ़े साधु और घने अंधेरे के सिवा और कोई नहीं था l एक छोटा सा दिया जल रहा था जिसमें मुझे उसके झुर्रियों वाले चेहरे से उसकी उपस्थिति का पता चल रहा था l

वह लेट गया l और उसने मुझसे कहा कि मेरे पैर दबाते जाओ और हम भगवत चर्चा करते जाएंगे l कुछ देर बाद मैंने देखा कि उस साधु ने बत्ती बुझा दी है l 

उसने पूछा कि पेपर पढ़ते हो l मैंने उसे उस दिन की सारी घटनाओं का ब्यौरा दे दिया l उसने पूछा कि क्या कभी तुमने बलात्कार शब्द के बारे में पड़ा है l मैंने सिर्फ हां कहां l

इसके बाद उसने मेरे हाथों को पकड़ कर उसकी जांघों के ऊपर रखा और कहा कि यहां दबाओ l 

उसने अपनी  बात आगे बढ़ाते हुए कहा कि क्या तुम्हें कभी "ऐसा" करने का मन हुआ है और उसने मेरा हाथ अपनी मुट्ठी से दबा दिया l

और इस एक प्रश्न के बाद  मुझे ऐसा लगा जैसे कोई  ट्रेन मेरे कान के पास से  सीटी बजाते हुए  धड़ धड़ा के निकल गई l मैं महसूस कर सकता था कि मेरे कान गर्म हो चुके हैं l जैसे उस ट्रेन के निकलने के बाद उसकी पटरियां भी गर्म हो जाती होगी l

इसके बाद भी उसने बहुत सारी बातें कहीं लेकिन जैसे मुझे वह याद नहीं आती या "याद नहीं आना" यह भी एक बहाना ही है  ताकि मैं उन्हें भूल सकूं l मैं चुप रहा रहा और भागकर अपने घर लौट आया l वह साधु अंधेरे में पड़ा रह गया l 

उस रात मुझे मेरा मोक्ष मिल गया था l मैं मोक्ष पाने के चक्रव्यूह से ही मुक्त हो गया था l

- पंकज देवड़ा

कहानी- लव स्टोरी नहीं हैं ये

वह लड़का और लड़की जब एक दूसरे को बांहों में भरते थे तो लगता था कि जैसे एक दूसरे के शरीरों को तोड़कर रूहों में जा धसेंगे ।

हर बार उनका एक दूसरे से मिलना पहली बार मिलने जितना रोंगटे खड़े कर देने वाला था। हर बार उनका एक दूसरे को चूमना पहली बार चूमने जितना निर्दयी था ।

वे जब एक दूसरे को चूमते थे तो होंठों को लहूलुहान कर देने की हद तक पहुंच जाते थे । उनके होठों से रिसने वाला खून जब उनकी गर्दनों और छातियों पर रिसता था तो लगता था कि जैसे अजंता की गुफाओं के भित्ति चित्र उकेर दिए गए हो ।

लड़का और लड़की मिलना चाहते थे, किसी ऐसी जगह पर जहां लोगों के हाथ लड़के की गर्दन और लड़की की छाती तक ना पहुंच सके । तभी लड़की ने कहा कि उसके मां-बाप किसी दूसरे शहर जा रहे हैं और वह चुपके से उसके घर मिलने आ सकता है ।

लड़का खुश हो गया और रात को चुपके से लड़की के घर पहुंच गया । उसका लड़की के पड़ोसियों से आंख बचाकर जाना उतना ही चुपके से था जितने 'चुपके' का सहारा लेकर उन पड़ोसियों के बच्चे के किन्ही और पड़ोसियों से बचकर प्यार करने जाते थे ।

उनके बच्चों का प्यार करना जिंदा रहने के लिए जरूरी था क्योंकि वक्त इतना खराब था कि नाक के आगे दो अंगुल तक कि अपने हिस्से की सांसे बचाए रखना भी बहुत मुश्किल था ।

लड़की ने लड़के को घर के अंदर घुसाया और फिर बाल बांधने लगी । वह हर बार ऐसा ही करती थी । वह जब भी लड़के के सामने होती अपने दोनों हाथ उठाकर अपने बाल पीछे की ओर बांधने का नाटक करती थी।

लड़की हमेशा स्लीवलेस पहनती थी इसलिए बाल बांधते हुए उसकी बगले इतनी सुंदर लगती थी कि लड़का खरगोश बनकर उनमें छुप जाना चाहता था ।

लड़के ने कहा कि उसे भूख लगी है और वह प्यार करना चाहता है । वह लड़की की गर्दन पर गर्म सांस बनकर तैरना चाहता है । उसकी नाभि के आसपास गुदगुदी बनकर रेंगना चाहता है । उसके होठों पर नमी बन कर खुद को लीप देना चाहता है ।

इसके बाद दोनों ने एक दूसरे से प्यार करना शुरू किया । इस अंधेरी रात में लड़की किसी नदी की तरह बह रही थी और वह लड़का किसी पत्ते पर रखे जलते दिए की तरह उसके प्रवाह में बहता जा रहा था ।

तभी उन्हें ऐसा लगा जैसे कोई उनका दरवाजा तोड़ रहा हो और थोड़ी ही देर में 30-40 लोगों की भीड़ उस लड़की के घर में घुस गई । वह सब मर्द थे और शोर मचा रहे थे । जोर-जोर से गालियां दे रहे थे । उन्होंने लड़की को ऐसी गाली दी जो वेश्या से मिलती-जुलती थी ।

भीड़ ने कहा कि उनकी महान संस्कृति इतनी भंगुर है कि एक लड़के और लड़की के शरीरों के घिसड़ने मात्र से भरभरा कर ढह जाएगी । इसलिए उनके शरीरों को टूटना होगा ।

लड़की ने कहा कि उसका शरीर कोई धर्मस्थल नहीं है जिसे तोड़े बगैर महान संस्कृति या मजहब की रक्षा नहीं की जा सकेगी ।

इसके बाद लड़का और लड़की अपनी जिंदगी की भीख मांगने लगे पर भीड़ नहीं मानी उन्होंने कहा कि उन दोनों की छातियों को चीर कर उनके दिल किसी धार्मिक किताब में रख दिए जाएंगे या फिर अशोक के पत्तों के साथ तोरण में बांधकर घर के आगे लटका दिए जाएंगे ताकि प्रेम जैसी बुरी चीज उनके सभ्य घरों की चौखट को लांघ ना सके ।

भीड़ उन दोनों को मारने लगी उनके हड्डियों के टूटने की आवाज़े ऐसी आ रही थी मानो कमरे में कोई यज्ञ चल रहा हो और उस यज्ञ में लकड़ियां जलते हुए टूट रही हो । रक्त घी की तरह बह रहा था और दीवारें उनके रक्त से ऐसी रंग गई थी जैसे किसी ने ना समझ में आने वाली लिपि से कोई श्लोक लिखे दिए हो ।

कुछ 15-16 साल के लड़के संस्कृति और देश की जय के नारे लगा रहे थे और साथ ही साथ मौत की ओर बढ़ती हुई उस लड़की के स्तनों और जांघों को छू रहे थे ताकि वे मृत्यु को अपनी उंगलियों पर मल सके और जब बहुत सालों बाद जब वे लड़के बूढ़े और अमर होंगे तब यही मृत्यु का स्पर्श उन्हें गर्माहट प्रदान करेगा ।

उनको मारते हुए भीड़ ने पड़ोस की दादी को धन्यवाद दिया कि उन्होंने लड़के को छुपते छुपाते जाते हुए देख लिया था वरना आज उनके मिलन के पश्चात उत्पन्न होने वाले पसीने की गंध से समूची संस्कृति का दम घुट सकता था ।

लोग उन दोनों को जल्दी से मार देना चाहते थे ताकि वे घर जाकर चाय पिए और अपनी बीवियों को चूमे और फिर अपने बच्चों को सिखाएं कि कैसे अपनी संस्कृतियों को बचाया जाए ।

साथ ही साथ वे अपने राजनैतिक ईश्वराें के सामने सिर झुकाना चाहते थे ताकि उन्हें बड़ी-बड़ी नौकरियों से नवाजा जाए और उन्हें अमरता का आशीर्वाद दिया जाए ।

पर ऐसा हो ना सका और भीड़ की उम्मीदों पर पानी फिर गया । कुछ पुलिस वाले वहां पहुंच गए और उन्हें भीड़ को खदेड़ते हुए लड़के और लड़की को अस्पताल पहुंचा दिया ।

- पंकज देवड़ा

कहानी - लाल साड़ी वाली

 मेरी नींद खुली और मैंने देखा कि वो मेरे ऊपर बैठी है,लाल साड़ी और खुले बालों में वो इतनी खूबसूरत लग रही थी जैसे किसी ने लाल तपा हुआ लोहा भट्ठी से निकालकर मेरी छाती पर रख दिया हो l

उसने अपनी उंगलियों से मेरा चेहरा सहलाया और इसके बाद वो अपना चेहरा मेरे चेहरे के करीब लेकर आ गई । उसने अपनी आंखें मेरी आंखों में गाड़ दी। ऐसा लग रहा था जैसे वो मेरी आंखों को चीरते हुए मेरी रूह में उतरने की कोशिश कर रही हो ।

दरअसल, ये रात की 3:00 के आसपास की घटना है और इसका शुरुआती सिरा इसी रात की 9:00 बजे के आस पास बंधा है जब मैं इस उज्जैन शहर की एक सड़क से होता हुआ अपने रिश्तेदार से मिलने जा रहा था, तभी मुझे पता चला कि अचानक से लोग हल्ला मचाते हुए जान बचाकर भागने लग गए हैं ।

हिंदू-मुस्लिम दंगे भड़क चुके थे और एक हत्यारी भीड़ दौड़ती हुई मेरी तरफ आ रही थी। मैं उससे बचने के लिए मुख्य सड़क को छोड़कर गलियों से होता हुआ एक घर की पिछली दीवार को फांद कर वहां आंगन में बनी टॉयलेट के सामने हांफता हुआ बैठ गया । और तभी मैंने देखा कि उस टॉयलेट का दरवाजा खुला और वो लाल साड़ी वाली औरत मेरे सामने खड़ी हो गई ।

मेरे बोलने से पहले ही वो सारा माजरा समझ चुकी थी ।  इसलिए उसने इशारा करके मुझे घर के अंदर बुलाया और कमरे में जाने को कहा । वहां रखे एक पलंग पर जाकर मैं लेट गया और मैंने देखा कि वह लाल साड़ी वाली महिला अपनी छोटी सी बच्ची को लेकर दूसरे कमरे में चली गई है ।

उस काली रात के घूप्प अंधेरे में घुलती हुई उस छोटे से बल्ब की रोशनी के सहारे मैं अपनी पुरानी यादों में उतर गया । 

अब से 8 साल पहले जब मैं 22  का था तब मैं अपने पास ही के एक गांव की लड़की से इश्क कर बैठा । वो इतनी सुंदर थी कि मैं जब भी उसे देखता था तो मुझे पहली बार देखने जितना ही रोमांच अनुभव होता था ।

क्योंकि हमारी जातियां अलग-अलग थी इसलिए मैंने घर से भागने का निर्णय लिया। वह भागना नहीं चाहती थी लेकिन मैंने उससे कहा कि उसे अपने परिवार और मेरे बीच किसी एक को चुनना होगा ।

और अगली रात जब सब लोग सोए थे तब चुपके से अपने परिवार को छोड़कर वह मेरे साथ भाग गई। हमने इंदौर जाकर एक मंदिर में शादी की और एक सस्ते होटल में ठहरने का निर्णय लिया ।

चूंकि मैंने अपनी प्रेमिका को कभी नहीं छुआ था इसलिए शादी के बाद मिलन की इस सुनहरी रात के लिए मैं काफी उत्साहित था लेकिन वह उतनी हीं घबराई हुई थी। परिवार को छोड़ने की उदासी उसके चेहरे पर पसरी हुई थी । उसकी आंख के आंसू टूटने का नाम भी नहीं ले रहे थे और मेरे समझाने पर वह ना चाहते हुए भी मिलन के लिए तैयार हो गई ।

मैं जितना उस सुनहरी रात को यादगार बनाना चाहता था, वह रात उससे भी ज्यादा यादगार होने के लिए  तरस रही थी। दरअसल हुआ यूं कि जब मैं उससे प्यार कर रहा था तब मैंने पाया कि कुंवारेपन के देवता का टूटा हुआ दूत अपना लाल संदेशा लेकर नहीं आया है और इसी बात पर मुझे अपनी पत्नी बन चुकी प्रेमिका की वफा पर शक हुआ। मुझे लगा कि वह मुझसे पहले किसी अन्य पुरुष के साथ अपना कौमार्य खो चुकी है ।

और इस बात पर मैं भड़क गया। मैंने उसके चरित्र पर उंगली उठाई और उसे गंदी-गंदी गालियां दी । उसने लाख कसमें खाई कि उसने मेरे सिवा कभी किसी को छुआ भी नहीं है लेकिन मैं उसकी बात मानना नहीं चाहता था क्योंकि मेरी मर्दानगी इस बात की इजाजत नहीं देती थी कि मैं किसी जूठन का उपभोग करूं ।

अंततः मैं उसे उसके गांव छोड़कर भाग गया । वो बहुत रो रही थी कि मेरे छोड़ देने के बाद लोग उसे ताने मार मार कर उसका जीना बेहाल कर देंगे। समाज तो क्या उसे उसका परिवार भी नहीं अपनाएगा लेकिन मैंने उसकी एक भी बात नहीं सुनी और उस दिन के बाद मुझे नहीं पता कि मेरी पत्नी का क्या हुआ ?

मुझे बाद में पता चला कि जब लड़कियां ज्यादा साइकिल चलाती है या खेलों में एक्टिव रहती है तो ऐसा हो सकता है कि कौमार्य टूटने का संकेत नहीं आए। मेरी पत्नी को भी साइकिल चलाने का बहुत शौक था लेकिन मैं उसे बेवफा मानना ज्यादा पसंद करूंगा क्योंकि इससे मेरे निर्णय को सही ठहराना आसान हो जाता है  और साथ ही मेरा जीना भी।

खैर, मैं नींद में डूबते उतराते हुए अपने पुराने जीवन की घटनाओं के बारे में सोच ही रहा था, तभी मुझे लगा कि कोई मेरे ऊपर बैठा हुआ है । मैंने आंखें खोली, देखा तो पाया कि वही लाल साड़ी वाली औरत मेरे ऊपर बैठी है जिसने मुझे बचाया था ।

उसने अपनी उंगलियों से मेरा चेहरा सहलाया और इसके बाद उसने अपनी अंगुलियां मेरे मुंह पर रख दी और वह अपना चेहरा मेरे चेहरे के करीब ले आई ।

और हां मैं यह बताना तो भूल ही गया कि यह लाल साड़ी वाली औरत मेरी वही बीवी है जिसे मैं 8 साल पहले छोड़कर भाग चुका था ।

उसने अपनी आंखें मेरी आंखों में गड़ा दी और जब मुझे लगा कि वह मुझे चूम कर इस काली रात को सुनहरा कर देगी तभी उसने चमकता हुआ खंजर मेरी छाती में गाड़ दिया । रक्त के फव्वारे छूट रहे थे और मेरे लाल रक्त से उसकी लाल साड़ी और ज्यादा सुर्ख हो गई थी ।   

 उसने वह खंजर निकाला और फिर कहा-
" उस दिन तेरे छोड़ने के बाद मैं पल पल कितनी मरी हूं इस बात का एहसास, एक बार मरने से नहीं होगा तुझे । अगर मेरा बस चले तो मैं तुझे बार-बार जिंदा करके मार दूं ।

और हां तुझे चमकता लाल खून बहुत पसंद है ना ?  देख तेरी छाती से कितना खून बह रहा है ! एकदम पवित्र और इतना कुंवारा जितना तूने कभी चाहा था ।"

और इसके बाद उसने वो खंजर मेरी छाती में गाड़ दिया ।

कहानी- वह आई जैसे गालों पर डिंपल आते हैं

जुलाई गिले दिनों में लिपटा था पर मेरी जिंदगी में अकेलेपन का सूरज ऐसा तप रहा था की बरसात मेरे लिए सिर्फ एक भीगा हुआ शब्द था, कोई मौसम या त्योहार नहीं ।

तभी वह आई जैसे गालों पर डिंपल आते हैं जैसे नाक की दहलीज पर नववधूओं सी सांसे आती है । 

मैं इंजीनियरिंग कॉलेज में था । हम मिलने लगे थे । पढ़ाईयों के बहानों के बीच । तकनीकी समस्याओं के सिर खपाउँ समाधानो के बीच । और जैसा कि होता है मुझे हो गया । प्यार । उसका बुखार, ऐसा चढ़ा कि वह सामने बैठी होती थी तो भी मुझे उसकी यादें आती थी । काली रातें रो-रोकर सफेद हो जाती थी । उसको देखता था तो लगता था कि जितना देखा कम देखा उसे । जितना चखा सांसों से कम चखा उसे । मुझे उसकी खूबसूरती का दरिया पीना था और कमबख्त मेरे पास आंख के एक जोड़ी प्याले थे ।

कहते हैं कि देवताओं के राजा इंद्र के पास हजारों आंखें हैं । पूरे शरीर पर फैली हुई । ताकि वह अप्सराओं की खूबसूरती को पी सकें । मुझे इंद्र होने की इच्छा होती थी वो तो अप्सरा थी ही। मुझे वह अप्सरा होने के साथ-साथ भगवान भी लगती थी । क्योंकि उम्र ऐसी थी कि स्त्री उस समय तक भगवान जैसी ही दिखती थी। अलभ्य और सुंदर । उसके इंसान होने की कल्पना को मैं सिरे से खारिज कर देता था ।

काश स्त्रियों को इंसान मान लेता । काश उनके हाड़ मांस को उसी मिट्टी का बना मान लेता जिस मिट्टी से मेरा बना है तो शायद चीजें कुछ आसान हो जाती । कुछ प्रेम कहानियां घट जाती ।  

क्योंकि दो इंसानों को प्यार करते हुए तो सब ने देखा है लेकिन एक भगवान और एक इंसान को प्यार करते हुए किसी ने नहीं देखा है सिर्फ सुना गया है और वह भी धर्म के पुराने ग्रंथों में । मैं इंसान था और वो मेरी भगवान थी । और यह प्रेम कहानी भी अधूरी ही होनी थी जैसे आगे आने वाली सारी प्रेम कहानियां अधूरी होनी ही है ।

- पंकज देवड़ा

गुड़ का गुड्डा, तिल की गुड़िया

कहानी- कत्थई चांद

वह पहली बार था जब मेरी सफेद पतंग पर बना कत्थई चाँद आसमान के मासूम गालों की मीठी मीठी किसियां लेने लगा था ।

वह पहली बार ही था जब मेरी पतंग के बाजुओं से पंख फूटे थे और वह किसी चिड़िया के नन्हे चूजे की तरह हड़बड़ाती हुई आसमानों में गोता लगाते जा रही थी । उसे देख कर मुझे इतना अच्छा लगता था जितना किसी को इश्क में अच्छा लगता है ।

वह पहली बार ही था जब मेरी पतंग में लगी बांस की दो खिपंचीयाँ एक दूसरे को गोद में भर कर शून्य में झूम रही थी ।

वह पहली बार ही था जब दिन और रात धरती के घूमने से नहीं बल्कि धागे से भरी घिरनी के अपने अक्ष पर घूमने से होने लगे थे । समय मेरी पतंग की जोत से बंधा था और मेरा मिजाज़ हवाओं के महकते दुपट्टे से ।

वो पहली बार ही था जब बारिशे आसमानों से नहीं किसी की भीगी हुई जुल्फों से हो रही थी । वो नहा कर छत पर आई थी और तौलिए से अपने बाल सुखा रही थी । जब उसके चेहरे के आसमान से जुल्फों के बादल हटे तो मैं पागल हो गया कि किसे देखूं ? एक कत्थई चांद मेरी पतंग पर और एक कत्थई चांद उसकी आंखों में तैर रहा था ।

मैंने उन सालों में पहली बार पाया कि मेरी छाती के बाएं हिस्से में एक पतंग उड़ रही है जिसका आकार पान के पत्ते की तरह है, जिस पर उमंग का एक कत्थई चांद उग आया है और उसकी जोत से बंधे हुए धागे का आखिरी सिरा मेरी उंगलियों से अभी-अभी फिसला है और बस तभी से मैं उस पतंग को पकड़ने के लिए दौड़े जा रहा हूं, दौड़े जा रहा हूं ।

- पंकज देवड़ा

रातें इतनी सर्द हुई है

रातें इतनी सर्द हुई है,
कि सांसे आती बर्फ हुई है ।

सुलगा दिए है मैंने दिन सारे,
हथेलियों में रगड़ रगड़ कर,
राख-अंगार कर दिए है कुछ तारे ।

अब तुम्हारे कंधे से फिसलती धूप का,
एक कतरा मेरी उंगलियों पर मल दो ।
तुम्हारी बाहों में जो मुलायम भेड़ें है,
उनके बीच मुझे मेमने सा रख लो l

- पंकज देवड़ा

तुम तोड़ती हो, जोड़ती हो रिवाज हूँ क्या ?

तुम तोड़ती हो, जोड़ती हो
रिवाज हूँ क्या ?

याद करते करते भूल जाती हो
इतिहास हूँ क्या ?

साथ रहती भी हो, कोसती भी
समाज हूँ क्या ?

मेरे हर कहे का, अलग मतलब निकालती हो
किसी मजहब की किताब हूँ क्या ?

- पंकज 

मेरे बेटे "बनी" के जन्मदिन पर मेरी विशेष शुभकामनाएं

मेरे बेटे "बनी" के जन्मदिन पर मेरी विशेष शुभकामनाएं -

तू खूब अच्छा इंसान बनना,
लोग तुझे प्यार से पूरा भर सके,
इसलिए खुद को खाली करने की हद तक
दूसरों पर प्यार उड़ेलना ।

बैंक बैलेंस हो, गाड़ी हो 
मन से मेल खाती लाड़ी हो ।
पर इन सबसे ज्यादा जरूरी है
तू किसी से नफरत ना पालना ।
लाख रस्ते दुनिया गढ़े तेरे लिए
तू खुद के मन का रास्ता ढालना ।

चार किताबे कम पढ़े तो चलेगा
लोगों के मन ज्यादा पढ़ना ।
खेलना, कूदना, चित्र बनाना 
चाहे कहानियां-कविता लिखना, 
अधूरा रहना, ज्यादा से ज्यादा सीखना ।

हर दिन ऐसे जीना जैसे एक नया जनम हो,
इतनी मोहब्बत करना जैसे यही तेरा धरम हो ।

-  पंकज देवड़ा

( Happy Birthday  Bunny)

तुम्हारे नाखूनों में चिपके हैं तितलियों के पंख

तुम्हारे नाखूनों में चिपके हैं
तितलियों के पंख,

तुम्हारी बाहों में दुबके हैं
खरगोश सारे मुलायम,

तुम्हारी पलकों पर झूलते हैं
चमचमाते जुगनू,

तुम्हारी नाभि में बंधा है 
कस्तूरी वाला हिरण ।

- पंकज देवड़ा

इश्क में रोज़गार

इतना बेशर्म हूं कि जहां-जहां फेकोगे वहां वहां उगूंगा मैं

इतना बेशर्म हूं कि जहां-जहां फेकोगे
वहां वहां उगूंगा मैं 

जितना धकेलोगे पीछे उतना अड़ूंगा मैं l
अपने समय का धुआं हूं, आग नहीं,
जितना फूँकोगे उतना उठूंगा मैं

तुम्हारे बगीचे का पेड़ नहीं हूं
के काट-छांट कर सजा दोगे
पुराने बरगद की तरह
अपनी ही टहनियों से फूटूंगा मैं 

मैं लाल चमकीला रक्त हूं
नसों में ना बहा
बोतलों में भी रहा
तो भी उतना ही ज़िंदा रहूंगा मैं

- पंकज देवड़ा

न्यूज़ चैनल का एंकर

उस न्यूज़ चैनल का एंकर जब,
कुत्तों की तरह चाटता था 
अपने प्रिय नेताओं के पांव l
तो उसकी जबान पर,
पड़ जाते थे, खुशामद के घाव l

जब वह उन्हीं घावों के साथ 
अपनी प्रेमिकाओं को 
चूमता था l
तो छूटता था,
उसके मुंह से फव्वाँरा, 
जनता  के लाल रक्त का l

और ढेर सारा मवाद,
होठों से लुढ़क कर 
रिसता था उनकी छातियों पर l
जो उपजा था 
उसकी डिबेट्स में
लोकतंत्र के फोड़ो को
मसल दिए जाने से l

- पंकज देवड़ा

इतना अंधेरा भर चुका था उस हृदय में

इतना अंधेरा भर चुका था उस हृदय में,
कि एक सूरज का जलकर 
खाक होना भी कम पड़ गया l

इतना सन्नाटा था वहां,
कि एक विचार,अपने आप को
सुनाने की जद्दोजेहद में मर गया l

सांसे एक दूसरे के क़त्ल में
इतनी व्यस्त थी वहां,
कि अपने आने और जाने के बीच के 
खालीपन को जीना भूल गई थी l

- पंकज देवड़ा

उनकी एड़ियों की दरारों में

उनकी एड़ियों की दरारों में,
तुम्हारे लहलहाते खेत
धस ना जाए l

छोड़ दो उनके घरों पर कब्जा, 
कहीं रूहों को बेदखल कर
वो तुम्हारे जिस्मों में बस ना जाए l

अगर तुम खुदा हो,
तो झुकाए रखो उन्हें तुम्हारे सजदे में l
कहीं उनका सिर उठाना
कोई मजहब नया बन न जाए l

- पंकज देवड़ा

उसकी उंगलियों से

उसकी उंगलियों से,
मेरी उंगलियों का 
गर्मियां चुराना जारी था l

उम्र इतनी बर्फ थी
कि कलेजा गर्म रखना भारी था l

- पंकज देवड़ा

मुझे किस्सा किस्सा कर दिया

आधा शहर बन गया हूं मैं