Sunday, June 22, 2014

पवित्र चुम्बन

मैं तुम्हे चूमुंगा उतना,
जितना भूख चूमती आँतों को,
आँसू आँख के कोनों को,
और प्यासें पानी को,
तुम्हारे होठों पर उकेरे गए,
सारे अनकहें शब्द, लज्जाएँ,
पवित्र भ्रूण सा अधुरा इश्क़,
दुःख-दर्द और कलाएँ,
मैं समेट लूँगा अपने चुम्बन की
लिजलिजी रूहों में |
और मेरा यकीन मानो मेरी जान,
किसी को भी मुक्त करने की हद तक चूमने के लिए,
नहीं लगता कोई क्रेश-कोर्स,
न ही कोई 101 तरीक़ों वाली किताब,
न हीं कोई समीकरण,
बस चाहिए तो दों होठों के जोड़ें,
जिन पर लीप दी गयी हो नमी,
और भुरभुरा दिए हो प्रेम बीज,
और जब मैं तुम्हारे ऊपर और निचे वाले होठ को
बारी-बारी से चूम रहा होऊंगा,
तो उन्हीं नितांत निजी और तथाकथित अश्लील पलों में,
मैं अपने सारे दुखों से मुक्त हो रहा होऊंगा |