मुन्नी, शीला और रजिया के बाद अब शालू ठुमके लगाने लग गयी है, समझ नहीं आता की गीतकारों और संगीतकारों के भेंजे कहाँ तैल लेने चले गए है,हिट सॉन्ग बनाने की चाह में आजकल लड़कियों के नाम भी गानों में शुरू हो गए है...खैर इसका सिलसिला तो "मोनिका.. ओह माय डार्लिंग" से भी पहले से शुरू हो गया होगा पर उन पुराने गानों में एक सलीका था, एक राहत थी, एक नजाकत थी,लेकिन आजकल ...
ऐसा भी नहीं है की गानों में सिर्फ लड़कियों के ही नाम इस्तेमाल हो रहे है,
लड़को के भी हो रहे है पर आप ज्यादा से ज्यादा क्या कहेंगे- "पप्पू कांट डांस" या "टिंकू जिया" इसके आलावा "टिंकू बदनाम हुआ" या "पप्पू जवान हुआ" सुनकर हमारे दिलो में कोई हलचल पैदा नहीं होगी, हलचल पैदा करनी हो तो लड़कियों के नाम उठाओ.
एक बार मुन्नी ऐसी बदनाम हुई की खुद तो दौलत और शोहरत कमाकर ले गयी पर पीछे छोड़ गयीं हज़ारो मुनियाँ और शिलाएं बदनाम होने के लिए-अपने गली मोहल्लों में. खबर आई थी की एक आदमी ने एक लड़के का खून इसलिए कर दिया क्यूंकि उसकी लड़की का नाम शीला था और उस लड़के ने उस लड़की को चिढ़ा-चिढ़ा कर उसका जीना हरम कर दिया,चिढाने के लिए कौन-सा गाना युस करता था बताने की जरूरत नहीं है -आप समझ ही गए होंगे.
एक और गाना आया 'मटन' समझ नहीं आया की यहाँ फेरी वालो की तरह चिल्ला - चिल्ला कर शारीरिक 'खूबियाँ' बताने की क्या जरूरत थी? और वेसें भी युवतियाँ कितनी भी आधुनिक क्यों न हो गयी हो, पर उनमे इतना तो आकर्षण तो बच ही गया है की अपने आपको मटन के साथ 'कम्पैर' करके सड़को पर फेरी लगाने की जरुरत नहीं है.
एक और गीत "दम मारो दम" में गीतकार ने इसके पुराने वर्जन में ऐसा लकवा मार दिया की सारी शालीनता दीपिका की स्कर्ट की तरह तुच्छ हो गयी.अल्प वस्त्र धारिणी दीपिका जब उछलते- कूदते "हरे कृष्णा-हरे राम ' गाती होंगी तो राम जी तो आखे ही बंद कर लेते होंगे, कृष्णा का पता नहीं है शायद रो लेते होंगे की इस गोपी ( दीपिका) के पास से चुराने के लिए 'कुछ' भी नहीं बचा.
खैर ...गीतकारो और संगीतकारों को अपनी माँ और बहनों के नाम गानों में इस्तेमाल करने चाहिए और ज्यादा 'रियल' लगेंगे जेसे कटरीना का 'शीला' बनकर इतराना रियल लगता है .
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(image-jokesprank.com)
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