Sunday, April 17, 2011

मैं छत पर टहलता हूँ अपनी

मैं छत पर टहलता हूँ अपनी 
तब भी 
जब लिम्बूं के आचार की बरनी 
माथे पर कपड़ा बांधे  
धुप में 
बेठी नहीं रहती, 
तब भी 
जब वो  लड़की उसकी छत पर
किताबो की आढ़ से
किसी को देखा नहीं करती,
तब भी 
जब तुलसी के पौधे 
और  अटारियों  के बीच
पिद्दी  सी मकड़ी 
जिद्दी से जाले नहीं बुनती,
तब भी  
जब पड़ोस की भाभी 
कपड़ों और गीली इच्छाओं को 
उन रस्सियों पर नहीं सुखाती, 
तब भी 
जब  ताजी सी दुल्हन 
पुरानी छत पर खढी हो 
नए रिश्ते नहीं चुनती, 
तब भी 
जब  उन  ऊँघे हुए रास्तों पर
बेशर्म बाराती, पगलाया दूल्हा 
बेसुरे बाजे, खास्ता जेनरेटर 
और सफेदपोश ट्यूब लायटे
नहीं घुमती



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