मैं छत पर टहलता हूँ अपनी
तब भी
जब लिम्बूं के आचार की बरनी
माथे पर कपड़ा बांधे
धुप में
बेठी नहीं रहती,
तब भी
जब वो लड़की उसकी छत पर
किताबो की आढ़ से
किसी को देखा नहीं करती,
तब भी
जब तुलसी के पौधे
और अटारियों के बीच
पिद्दी सी मकड़ी
जिद्दी से जाले नहीं बुनती,
तब भी
जब पड़ोस की भाभी
कपड़ों और गीली इच्छाओं को
उन रस्सियों पर नहीं सुखाती,
तब भी
जब ताजी सी दुल्हन
पुरानी छत पर खढी हो
नए रिश्ते नहीं चुनती,
तब भी
जब उन ऊँघे हुए रास्तों पर
बेशर्म बाराती, पगलाया दूल्हा
बेसुरे बाजे, खास्ता जेनरेटर
और सफेदपोश ट्यूब लायटे
नहीं घुमती
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