इतना बेशर्म हूं कि जहां-जहां फेकोगे
वहां वहां उगूंगा मैं
जितना धकेलोगे पीछे उतना अड़ूंगा मैं l
अपने समय का धुआं हूं, आग नहीं,
जितना फूँकोगे उतना उठूंगा मैं
तुम्हारे बगीचे का पेड़ नहीं हूं
के काट-छांट कर सजा दोगे
पुराने बरगद की तरह
अपनी ही टहनियों से फूटूंगा मैं
मैं लाल चमकीला रक्त हूं
नसों में ना बहा
बोतलों में भी रहा
तो भी उतना ही ज़िंदा रहूंगा मैं
- पंकज देवड़ा
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