Tuesday, August 24, 2021

कहानी- कत्थई चांद

वह पहली बार था जब मेरी सफेद पतंग पर बना कत्थई चाँद आसमान के मासूम गालों की मीठी मीठी किसियां लेने लगा था ।

वह पहली बार ही था जब मेरी पतंग के बाजुओं से पंख फूटे थे और वह किसी चिड़िया के नन्हे चूजे की तरह हड़बड़ाती हुई आसमानों में गोता लगाते जा रही थी । उसे देख कर मुझे इतना अच्छा लगता था जितना किसी को इश्क में अच्छा लगता है ।

वह पहली बार ही था जब मेरी पतंग में लगी बांस की दो खिपंचीयाँ एक दूसरे को गोद में भर कर शून्य में झूम रही थी ।

वह पहली बार ही था जब दिन और रात धरती के घूमने से नहीं बल्कि धागे से भरी घिरनी के अपने अक्ष पर घूमने से होने लगे थे । समय मेरी पतंग की जोत से बंधा था और मेरा मिजाज़ हवाओं के महकते दुपट्टे से ।

वो पहली बार ही था जब बारिशे आसमानों से नहीं किसी की भीगी हुई जुल्फों से हो रही थी । वो नहा कर छत पर आई थी और तौलिए से अपने बाल सुखा रही थी । जब उसके चेहरे के आसमान से जुल्फों के बादल हटे तो मैं पागल हो गया कि किसे देखूं ? एक कत्थई चांद मेरी पतंग पर और एक कत्थई चांद उसकी आंखों में तैर रहा था ।

मैंने उन सालों में पहली बार पाया कि मेरी छाती के बाएं हिस्से में एक पतंग उड़ रही है जिसका आकार पान के पत्ते की तरह है, जिस पर उमंग का एक कत्थई चांद उग आया है और उसकी जोत से बंधे हुए धागे का आखिरी सिरा मेरी उंगलियों से अभी-अभी फिसला है और बस तभी से मैं उस पतंग को पकड़ने के लिए दौड़े जा रहा हूं, दौड़े जा रहा हूं ।

- पंकज देवड़ा

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