Pankaj Devda
I love to write about what I feel
Tuesday, August 24, 2021
तुम तोड़ती हो, जोड़ती हो रिवाज हूँ क्या ?
तुम तोड़ती हो, जोड़ती हो
रिवाज हूँ क्या ?
याद करते करते भूल जाती हो
इतिहास हूँ क्या ?
साथ रहती भी हो, कोसती भी
समाज हूँ क्या ?
मेरे हर कहे का, अलग मतलब निकालती हो
किसी मजहब की किताब हूँ क्या ?
- पंकज
No comments:
Post a Comment
Newer Post
Older Post
Home
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
No comments:
Post a Comment