जुलाई गिले दिनों में लिपटा था पर मेरी जिंदगी में अकेलेपन का सूरज ऐसा तप रहा था की बरसात मेरे लिए सिर्फ एक भीगा हुआ शब्द था, कोई मौसम या त्योहार नहीं ।
तभी वह आई जैसे गालों पर डिंपल आते हैं जैसे नाक की दहलीज पर नववधूओं सी सांसे आती है ।
मैं इंजीनियरिंग कॉलेज में था । हम मिलने लगे थे । पढ़ाईयों के बहानों के बीच । तकनीकी समस्याओं के सिर खपाउँ समाधानो के बीच । और जैसा कि होता है मुझे हो गया । प्यार । उसका बुखार, ऐसा चढ़ा कि वह सामने बैठी होती थी तो भी मुझे उसकी यादें आती थी । काली रातें रो-रोकर सफेद हो जाती थी । उसको देखता था तो लगता था कि जितना देखा कम देखा उसे । जितना चखा सांसों से कम चखा उसे । मुझे उसकी खूबसूरती का दरिया पीना था और कमबख्त मेरे पास आंख के एक जोड़ी प्याले थे ।
कहते हैं कि देवताओं के राजा इंद्र के पास हजारों आंखें हैं । पूरे शरीर पर फैली हुई । ताकि वह अप्सराओं की खूबसूरती को पी सकें । मुझे इंद्र होने की इच्छा होती थी वो तो अप्सरा थी ही। मुझे वह अप्सरा होने के साथ-साथ भगवान भी लगती थी । क्योंकि उम्र ऐसी थी कि स्त्री उस समय तक भगवान जैसी ही दिखती थी। अलभ्य और सुंदर । उसके इंसान होने की कल्पना को मैं सिरे से खारिज कर देता था ।
काश स्त्रियों को इंसान मान लेता । काश उनके हाड़ मांस को उसी मिट्टी का बना मान लेता जिस मिट्टी से मेरा बना है तो शायद चीजें कुछ आसान हो जाती । कुछ प्रेम कहानियां घट जाती ।
क्योंकि दो इंसानों को प्यार करते हुए तो सब ने देखा है लेकिन एक भगवान और एक इंसान को प्यार करते हुए किसी ने नहीं देखा है सिर्फ सुना गया है और वह भी धर्म के पुराने ग्रंथों में । मैं इंसान था और वो मेरी भगवान थी । और यह प्रेम कहानी भी अधूरी ही होनी थी जैसे आगे आने वाली सारी प्रेम कहानियां अधूरी होनी ही है ।
- पंकज देवड़ा
No comments:
Post a Comment