15 साल की उम्र ऐसी होती है जिसमें लोग किसी और की बाहों में मोक्ष खोजते हैं लेकिन मैं अपना मोक्ष वेदांत की किताबों और साधुओं के गैरवे वस्त्र में खोज रहा था l
मोक्ष पाना मेरे लिए प्रेम पाने से ज्यादा जरूरी था l और इसीलिए मैं अपने गांव में साधुओं को ढूंढता था, उनसे मुक्ति के रहस्य पूछता था l
वो भी एक साधु ही था l सफेद वस्त्र पहने l उस धर्म से वास्ता रखता था जिस की तपस्या और त्याग की मिसाले दी जाती हैं l
वह उसी धर्म के लोगों द्वारा बनाई एक धर्मशाला में रहने आया था l छोटे-छोटे बच्चे उसके पास आकर श्लोक सीखने लगे l मैं भी उसके पास गया l मैंने उससे पूछा की मुक्ति कहां मिलेगी l उसने मुझे सात आसमानों के पार का कोई पता दिया जिसे वह खुद ढूंढने में लगा हुआ था l
उसने मुझसे कहा कि अगर तुम्हें ज्यादा ज्ञान चाहिए तो रात में आना, और भी बच्चे आ रहे हैं l उसकी बात मान कर मैं रात में धर्मशाला में गया l वहां पर उस बूढ़े साधु और घने अंधेरे के सिवा और कोई नहीं था l एक छोटा सा दिया जल रहा था जिसमें मुझे उसके झुर्रियों वाले चेहरे से उसकी उपस्थिति का पता चल रहा था l
वह लेट गया l और उसने मुझसे कहा कि मेरे पैर दबाते जाओ और हम भगवत चर्चा करते जाएंगे l कुछ देर बाद मैंने देखा कि उस साधु ने बत्ती बुझा दी है l
उसने पूछा कि पेपर पढ़ते हो l मैंने उसे उस दिन की सारी घटनाओं का ब्यौरा दे दिया l उसने पूछा कि क्या कभी तुमने बलात्कार शब्द के बारे में पड़ा है l मैंने सिर्फ हां कहां l
इसके बाद उसने मेरे हाथों को पकड़ कर उसकी जांघों के ऊपर रखा और कहा कि यहां दबाओ l
उसने अपनी बात आगे बढ़ाते हुए कहा कि क्या तुम्हें कभी "ऐसा" करने का मन हुआ है और उसने मेरा हाथ अपनी मुट्ठी से दबा दिया l
और इस एक प्रश्न के बाद मुझे ऐसा लगा जैसे कोई ट्रेन मेरे कान के पास से सीटी बजाते हुए धड़ धड़ा के निकल गई l मैं महसूस कर सकता था कि मेरे कान गर्म हो चुके हैं l जैसे उस ट्रेन के निकलने के बाद उसकी पटरियां भी गर्म हो जाती होगी l
इसके बाद भी उसने बहुत सारी बातें कहीं लेकिन जैसे मुझे वह याद नहीं आती या "याद नहीं आना" यह भी एक बहाना ही है ताकि मैं उन्हें भूल सकूं l मैं चुप रहा रहा और भागकर अपने घर लौट आया l वह साधु अंधेरे में पड़ा रह गया l
उस रात मुझे मेरा मोक्ष मिल गया था l मैं मोक्ष पाने के चक्रव्यूह से ही मुक्त हो गया था l
- पंकज देवड़ा
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