मैं भगोड़ा था, परिस्थितियों से डरकर भागना मुझे बहुत अच्छा लगता था. 16 की उम्र में एक दिन मैं घर छोड़कर भाग गया क्योंकि मैं मोक्ष पाना चाहता था l साधु बन जाना चाहता था l
27 की उम्र तक लगभग में 10 कंपनियां छोड़कर भाग चुका था l
इसी बीच कुछ रिश्तो के बंधन थे जिनको मैं तोड़कर भाग जाना चाहता था l
एक कंपनी में जब उसके मालिक से लड़ कर भाग रहा था तब मेरे दोस्त ने मुझसे कहा था -"कब तक भागोगे पंकज ?"
उसका यह सवाल जैसे दिन-रात मेरा पीछा करता रहता था मैं जब भी कुछ छोड़कर भागता था मेरे दिमाग में उसका यह सवाल टेप रिकॉर्डर की तरह बजता रहता था l
2016 में, मैं मुंबई भाग चुका था ताकि फिल्में बना सकूं l लेकिन मुंबई पहुंचते ही एक कमरे की पिछली खिड़की से मैं लोगों को आते जाते देख रहा था और सोच रहा था क्या यही वो पल है जिसके लिए मैं सब कुछ छोड़ कर भागना चाहता था और इसका जवाब "ना"आया और उसी पल में मुंबई छोड़कर भाग आया.
मैं अपने भगोड़ेपन से परेशान हो चुका था, मेरा डिप्रेशन सुसाइडल होने की हद तक बढ़ चुका था मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मैं अपनी मुसीबतों से कैसे भाग जाऊं ?
न दिल्ली में मुझे मोक्ष मिलता था ना मुंबई में मुझे सुकून , ना अध्यात्म मुझे जीवन कि संपूर्णता दे पा रहा था और ना ही फिल्म मेकिंग जिंदगी जीने का लक्ष्य l
क्या है वो जो मुझे शांति दे दे ? क्या है वो जो मुझे अपने आप से मुक्ति दे दे? मेरी चिंताओं से, मेरी समस्याओं से पीछा छुड़ा दे ? तभी एक जादू हुआ जिसने मेरी पूरी जिंदगी बदल दी l
वह जादू यह था कि मैंने अपने आप को स्वीकार कर लिया था अपनी संपूर्ण कमियों और खामियों के साथ, अपनी वीभत्सताओ के साथ l मैंने अपनी गलतियां own की क्योंकि उसके लिए मैं किसी और को दोष नहीं दे सकता l
हां मैं भगोड़ा था क्योंकि मैं सुख की तलाश में भटकता था, मैं मोक्ष पाना चाहता था क्योंकि मैं अमर होना चाहता था, मैं फिल्में बनाना चाहता था क्योंकि मैं प्रसिद्ध होना चाहता था l
एक इंसान होने के नाते चाहना गलत नहीं है, उसके लिए कोशिश करना गलत नहीं है, कोशिश करते हुए असफल हो जाना गलत नहीं है, डरना गलत नहीं है, भाग जाना गलत नहीं है l
मैंने खुद को माफी दे दी और उसी दिन मैं मुक्त हो गया l
No comments:
Post a Comment