शक्करपारा होे जाने के मेरे दिनों में,
वो मीठी चाशनी बन जाती l
गुझियों के खोल में अगर मैं बदल जाता
वो खुशबूदार भरावन सी भर जाती l
मेरे रात हो जाने कि सदियों में,
वो दिवाली बनकर कर मुझे बचाए रखती थी l
वो मीठी चाशनी बन जाती l
गुझियों के खोल में अगर मैं बदल जाता
वो खुशबूदार भरावन सी भर जाती l
मेरे रात हो जाने कि सदियों में,
वो दिवाली बनकर कर मुझे बचाए रखती थी l
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