Thursday, October 10, 2019

एक बोली है मालवी

एक बोली है मालवी,
जब रोती है तो उसकी आंखों से
टपकते हैं खून से सने शब्द l

क्योंकि उसके अपने ही लोग,
उसे चुप करा कर,
गाड़ देना चाहते हैं अपने ही आंगन में,
ताकि बोया जा सके एक पौधा
जो उगाए एबीसीडी और "अनाराम"

जैसे बची रहती है कोई विधवा मां,
अपने बच्चों के बीच,
ठीक वैसी ही बची हुई है वह,
उन लोगों के बीच,
जो माने जाते हैं सृष्टि से भी पुराने,
और जब वह रोते हैं इस बोली में,
तो दुनिया हंसती है उनके आंसुओं पर,
उन्हें गवार कहकर l

एक बोली है मालवी,
जो उगती है कपास के फूलों में,
जात्राओं और हाटो के झूलों में l
जो खाती है कुल्फी,
लड़ाती है इश्क l
गाती है संजा,
और फिर मार दी जाती है,
अपने ही कुलों में l

- पंकज देवड़ा

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