Thursday, October 10, 2019

जातिगत श्रेष्ठता व शाब्दिक हिंसा के दम पर अपना दबदबा बनाए रखने वाला समाज

सोनी को सुनारटा, दर्जी जात वाले को दरजेटा,  नाई को नव्वा नाम से गाली नहीं दी तो हमारे समाज में गाली देने का सुख लोगों की जिबान को नसीब नहीं होता है l

जब तक ब्राह्मणों को मांगने वालों के साथ और राजपूतों को पियक्कड़  या गरम खोपड़ी से मिलते जुलते किसी विशेषण से सम्मानित नहीं किया तो मतलब गुस्से का पूरा इज़हार नहीं हुआ l

मेरे गांव में पाटीदार और कुमावत समाज के लोगों के बीच दुश्मनी चलती रहती थी और इसी दुश्मनी को जाहिर करने के लिए कुमावत समाज के लोग पाटीदारों को कागला और पाटीदार समाज के लोग कुमावतो को टेपला नाम देकर अपनी जातिगत श्रेष्ठता प्रदर्शित करते थे l

और हां, SC  की जातियों  को हम कैसे भूल सकते हैं, जूते सिलने वालों और सफाई करने वालों की जातियां,  सदियों से अपमान सहने वालों की जातियां,   अपनी जातियों के नामों को गंदी गालियों में तब्दील होने से बचाने का संघर्ष करने वाले लोगों की जातियां l

10 -12 साल के स्कूली बच्चे जो ऊंची जाति से संबंध रखते हैं वे दलितों को चमाड़ला कहकर अपना गुस्सा दर्शाते हैं l

और ST का आदिवासी भील समाज जिसके लोगों की गरीबी का मजाक उड़ाने के लिए उनकी तुलना बंदर से की जाती है उन्हें "मामा" कहां जाता है और वह भी उन लोगों द्वारा जिनके महल उन्हीं आदिवासियों द्वारा दिए गए व्यापार से खड़े किए गए हैं l

और इससे भी ज्यादा आश्चर्यजनक तो यह जिन धर्मों में जातियों का कॉन्सेप्ट नहीं है वह भी जातियों को उतनी हि तत्परता से मानने का प्रयास करते हैं जितना हिंदू धर्म के लोग करते हैं l

जैसे एक जैन या मुस्लिम भी किसी दलित के लिए वही हेय भाव रखेगा जो एक हिंदू धर्म वाला उनके लिए रख सकता है l

इस्लाम जिसकी स्थापना समानता के आधार पर की गई थी वह भी भारत में आकर जातिगत भेदभाव से बच नहीं सका और उसमें भी उच्च कुल के मुस्लिम झाड़ू लगाने वाले या ऐसे ही किसी काम को  करने वाले मुस्लिम परिवारों को नीची निगाहों से देखते हैं l

खान, शाह, मंसूरी, मेव, हेला इस्लाम के अंदर पनपने वाली जातियों की हायरारिकी है l

दरअसल हमारा समाज एक ऐसा समाज है जो एक दूसरे को दबाना चाहता है l जातिगत श्रेष्ठता व शाब्दिक हिंसा के दम पर  अपना दबदबा बनाए रखना चाहता है l सबसे छोटी जाति का व्यक्ति भी यह सोच कर खुश है कि उससे छोटी भी कोई एक जाति है  l जिसे वह गरिया सकता है l

धन्य है भारत का जातिवाद और धन्य है यहां के लोग जिनके लिए एक जीते जागते इंसान से बढ़कर उसकी उस जाति का महत्व होता है  जो दरअसल कहीं नहीं है बस उनके दिमाग की उपज है l

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