Tuesday, August 24, 2021

कहानी - मोक्ष याद नहीं आता उसकी आंखें याद आती है

लड़कियों को नहीं देखने का व्रत लिया था मैंने l उन 5 सालों के दौरान मिली पांच लड़कियों के भी चेहरे याद नहीं आते l 

कभी-कभी तो ऐसा होता था कि कॉलेज में कोई लड़की कहती कि मैं तुम्हारे साथ स्कूल में पढ़ती थी तो लगता था कि स्कूल के दिन किसी और जन्म की बात रहे होंगे l क्योंकि मैंने 15 से 19 की उम्र के बीच साधु बनने की ठानी थी और ब्रह्मचर्य इसकी पहली शर्त था l

मैं सुंदर मोक्ष की कामना करता था पर लड़कियों की सुंदरता से डरना चाहता था l

12वीं शुरू हुई थी l मैं उज्जैन की एक प्रसिद्ध कोचिंग पर मैथ्स पढ़ने गया l छूटा हुआ कोर्स पूरा करवाने के लिए असिस्टेंट लड़कियां पास बैठकर पढ़ाती थी l 

वो उनमें से एक थी l जब वो पढ़ाती थी तो सवाल तो दूर सांस लेना भी याद नहीं रहता था l और अगर गलती से कोई सांस आती भी थी तो इतनी गर्म होती थी कि ब्रह्मचर्य का व्रत पिघल जाता था ,सन्यास की इच्छा पीछे छूटती जाती थी और कभी-कभी तो एक जन्म भी कम पढ़ने लग जाता था l 

पसीने ऐसे छूटते थे कि लगता था कि शिप्रा नदी का उद्गम मेरे ही सिर से हुआ होगा l

फिर कुछ हालात बने और कोचिंग छूट गई, ब्रह्मचर्य बचा रह गया l और साल भर बाद ब्रह्मचर्य और मोक्ष दोनों की इच्छा छूट गई l 

मुक्ति का बंधन टूट गया था, मैं मरना और फिर जन्मना चाहता था l मैं प्यार करना चाहता था l 

और अब ऐसा होता है कि मोक्ष याद नहीं आता उसकी आंखें अब भी याद आती है l

-  पंकज देवड़ा

कहानी - मोक्ष की रात

15 साल की उम्र ऐसी होती है जिसमें लोग किसी और की बाहों में मोक्ष खोजते हैं लेकिन मैं अपना मोक्ष वेदांत की किताबों और साधुओं के गैरवे वस्त्र में खोज रहा था l

मोक्ष पाना मेरे लिए प्रेम पाने से ज्यादा जरूरी था l और इसीलिए मैं अपने गांव में साधुओं को ढूंढता था, उनसे मुक्ति के रहस्य पूछता था l

वो भी एक साधु ही था l सफेद वस्त्र पहने l उस धर्म से वास्ता रखता था जिस की तपस्या और त्याग की मिसाले दी जाती हैं l

वह उसी धर्म के लोगों द्वारा बनाई एक धर्मशाला में रहने आया था l छोटे-छोटे बच्चे उसके पास आकर श्लोक सीखने लगे l मैं भी उसके पास गया l मैंने उससे पूछा की मुक्ति कहां मिलेगी l उसने मुझे सात आसमानों के पार का कोई पता दिया जिसे वह खुद ढूंढने में लगा हुआ था l

उसने मुझसे कहा कि अगर तुम्हें ज्यादा ज्ञान चाहिए तो रात में आना, और भी बच्चे आ रहे हैं l उसकी बात मान कर मैं रात में धर्मशाला में गया l वहां पर उस बूढ़े साधु और घने अंधेरे के सिवा और कोई नहीं था l एक छोटा सा दिया जल रहा था जिसमें मुझे उसके झुर्रियों वाले चेहरे से उसकी उपस्थिति का पता चल रहा था l

वह लेट गया l और उसने मुझसे कहा कि मेरे पैर दबाते जाओ और हम भगवत चर्चा करते जाएंगे l कुछ देर बाद मैंने देखा कि उस साधु ने बत्ती बुझा दी है l 

उसने पूछा कि पेपर पढ़ते हो l मैंने उसे उस दिन की सारी घटनाओं का ब्यौरा दे दिया l उसने पूछा कि क्या कभी तुमने बलात्कार शब्द के बारे में पड़ा है l मैंने सिर्फ हां कहां l

इसके बाद उसने मेरे हाथों को पकड़ कर उसकी जांघों के ऊपर रखा और कहा कि यहां दबाओ l 

उसने अपनी  बात आगे बढ़ाते हुए कहा कि क्या तुम्हें कभी "ऐसा" करने का मन हुआ है और उसने मेरा हाथ अपनी मुट्ठी से दबा दिया l

और इस एक प्रश्न के बाद  मुझे ऐसा लगा जैसे कोई  ट्रेन मेरे कान के पास से  सीटी बजाते हुए  धड़ धड़ा के निकल गई l मैं महसूस कर सकता था कि मेरे कान गर्म हो चुके हैं l जैसे उस ट्रेन के निकलने के बाद उसकी पटरियां भी गर्म हो जाती होगी l

इसके बाद भी उसने बहुत सारी बातें कहीं लेकिन जैसे मुझे वह याद नहीं आती या "याद नहीं आना" यह भी एक बहाना ही है  ताकि मैं उन्हें भूल सकूं l मैं चुप रहा रहा और भागकर अपने घर लौट आया l वह साधु अंधेरे में पड़ा रह गया l 

उस रात मुझे मेरा मोक्ष मिल गया था l मैं मोक्ष पाने के चक्रव्यूह से ही मुक्त हो गया था l

- पंकज देवड़ा

कहानी- लव स्टोरी नहीं हैं ये

वह लड़का और लड़की जब एक दूसरे को बांहों में भरते थे तो लगता था कि जैसे एक दूसरे के शरीरों को तोड़कर रूहों में जा धसेंगे ।

हर बार उनका एक दूसरे से मिलना पहली बार मिलने जितना रोंगटे खड़े कर देने वाला था। हर बार उनका एक दूसरे को चूमना पहली बार चूमने जितना निर्दयी था ।

वे जब एक दूसरे को चूमते थे तो होंठों को लहूलुहान कर देने की हद तक पहुंच जाते थे । उनके होठों से रिसने वाला खून जब उनकी गर्दनों और छातियों पर रिसता था तो लगता था कि जैसे अजंता की गुफाओं के भित्ति चित्र उकेर दिए गए हो ।

लड़का और लड़की मिलना चाहते थे, किसी ऐसी जगह पर जहां लोगों के हाथ लड़के की गर्दन और लड़की की छाती तक ना पहुंच सके । तभी लड़की ने कहा कि उसके मां-बाप किसी दूसरे शहर जा रहे हैं और वह चुपके से उसके घर मिलने आ सकता है ।

लड़का खुश हो गया और रात को चुपके से लड़की के घर पहुंच गया । उसका लड़की के पड़ोसियों से आंख बचाकर जाना उतना ही चुपके से था जितने 'चुपके' का सहारा लेकर उन पड़ोसियों के बच्चे के किन्ही और पड़ोसियों से बचकर प्यार करने जाते थे ।

उनके बच्चों का प्यार करना जिंदा रहने के लिए जरूरी था क्योंकि वक्त इतना खराब था कि नाक के आगे दो अंगुल तक कि अपने हिस्से की सांसे बचाए रखना भी बहुत मुश्किल था ।

लड़की ने लड़के को घर के अंदर घुसाया और फिर बाल बांधने लगी । वह हर बार ऐसा ही करती थी । वह जब भी लड़के के सामने होती अपने दोनों हाथ उठाकर अपने बाल पीछे की ओर बांधने का नाटक करती थी।

लड़की हमेशा स्लीवलेस पहनती थी इसलिए बाल बांधते हुए उसकी बगले इतनी सुंदर लगती थी कि लड़का खरगोश बनकर उनमें छुप जाना चाहता था ।

लड़के ने कहा कि उसे भूख लगी है और वह प्यार करना चाहता है । वह लड़की की गर्दन पर गर्म सांस बनकर तैरना चाहता है । उसकी नाभि के आसपास गुदगुदी बनकर रेंगना चाहता है । उसके होठों पर नमी बन कर खुद को लीप देना चाहता है ।

इसके बाद दोनों ने एक दूसरे से प्यार करना शुरू किया । इस अंधेरी रात में लड़की किसी नदी की तरह बह रही थी और वह लड़का किसी पत्ते पर रखे जलते दिए की तरह उसके प्रवाह में बहता जा रहा था ।

तभी उन्हें ऐसा लगा जैसे कोई उनका दरवाजा तोड़ रहा हो और थोड़ी ही देर में 30-40 लोगों की भीड़ उस लड़की के घर में घुस गई । वह सब मर्द थे और शोर मचा रहे थे । जोर-जोर से गालियां दे रहे थे । उन्होंने लड़की को ऐसी गाली दी जो वेश्या से मिलती-जुलती थी ।

भीड़ ने कहा कि उनकी महान संस्कृति इतनी भंगुर है कि एक लड़के और लड़की के शरीरों के घिसड़ने मात्र से भरभरा कर ढह जाएगी । इसलिए उनके शरीरों को टूटना होगा ।

लड़की ने कहा कि उसका शरीर कोई धर्मस्थल नहीं है जिसे तोड़े बगैर महान संस्कृति या मजहब की रक्षा नहीं की जा सकेगी ।

इसके बाद लड़का और लड़की अपनी जिंदगी की भीख मांगने लगे पर भीड़ नहीं मानी उन्होंने कहा कि उन दोनों की छातियों को चीर कर उनके दिल किसी धार्मिक किताब में रख दिए जाएंगे या फिर अशोक के पत्तों के साथ तोरण में बांधकर घर के आगे लटका दिए जाएंगे ताकि प्रेम जैसी बुरी चीज उनके सभ्य घरों की चौखट को लांघ ना सके ।

भीड़ उन दोनों को मारने लगी उनके हड्डियों के टूटने की आवाज़े ऐसी आ रही थी मानो कमरे में कोई यज्ञ चल रहा हो और उस यज्ञ में लकड़ियां जलते हुए टूट रही हो । रक्त घी की तरह बह रहा था और दीवारें उनके रक्त से ऐसी रंग गई थी जैसे किसी ने ना समझ में आने वाली लिपि से कोई श्लोक लिखे दिए हो ।

कुछ 15-16 साल के लड़के संस्कृति और देश की जय के नारे लगा रहे थे और साथ ही साथ मौत की ओर बढ़ती हुई उस लड़की के स्तनों और जांघों को छू रहे थे ताकि वे मृत्यु को अपनी उंगलियों पर मल सके और जब बहुत सालों बाद जब वे लड़के बूढ़े और अमर होंगे तब यही मृत्यु का स्पर्श उन्हें गर्माहट प्रदान करेगा ।

उनको मारते हुए भीड़ ने पड़ोस की दादी को धन्यवाद दिया कि उन्होंने लड़के को छुपते छुपाते जाते हुए देख लिया था वरना आज उनके मिलन के पश्चात उत्पन्न होने वाले पसीने की गंध से समूची संस्कृति का दम घुट सकता था ।

लोग उन दोनों को जल्दी से मार देना चाहते थे ताकि वे घर जाकर चाय पिए और अपनी बीवियों को चूमे और फिर अपने बच्चों को सिखाएं कि कैसे अपनी संस्कृतियों को बचाया जाए ।

साथ ही साथ वे अपने राजनैतिक ईश्वराें के सामने सिर झुकाना चाहते थे ताकि उन्हें बड़ी-बड़ी नौकरियों से नवाजा जाए और उन्हें अमरता का आशीर्वाद दिया जाए ।

पर ऐसा हो ना सका और भीड़ की उम्मीदों पर पानी फिर गया । कुछ पुलिस वाले वहां पहुंच गए और उन्हें भीड़ को खदेड़ते हुए लड़के और लड़की को अस्पताल पहुंचा दिया ।

- पंकज देवड़ा

कहानी - लाल साड़ी वाली

 मेरी नींद खुली और मैंने देखा कि वो मेरे ऊपर बैठी है,लाल साड़ी और खुले बालों में वो इतनी खूबसूरत लग रही थी जैसे किसी ने लाल तपा हुआ लोहा भट्ठी से निकालकर मेरी छाती पर रख दिया हो l

उसने अपनी उंगलियों से मेरा चेहरा सहलाया और इसके बाद वो अपना चेहरा मेरे चेहरे के करीब लेकर आ गई । उसने अपनी आंखें मेरी आंखों में गाड़ दी। ऐसा लग रहा था जैसे वो मेरी आंखों को चीरते हुए मेरी रूह में उतरने की कोशिश कर रही हो ।

दरअसल, ये रात की 3:00 के आसपास की घटना है और इसका शुरुआती सिरा इसी रात की 9:00 बजे के आस पास बंधा है जब मैं इस उज्जैन शहर की एक सड़क से होता हुआ अपने रिश्तेदार से मिलने जा रहा था, तभी मुझे पता चला कि अचानक से लोग हल्ला मचाते हुए जान बचाकर भागने लग गए हैं ।

हिंदू-मुस्लिम दंगे भड़क चुके थे और एक हत्यारी भीड़ दौड़ती हुई मेरी तरफ आ रही थी। मैं उससे बचने के लिए मुख्य सड़क को छोड़कर गलियों से होता हुआ एक घर की पिछली दीवार को फांद कर वहां आंगन में बनी टॉयलेट के सामने हांफता हुआ बैठ गया । और तभी मैंने देखा कि उस टॉयलेट का दरवाजा खुला और वो लाल साड़ी वाली औरत मेरे सामने खड़ी हो गई ।

मेरे बोलने से पहले ही वो सारा माजरा समझ चुकी थी ।  इसलिए उसने इशारा करके मुझे घर के अंदर बुलाया और कमरे में जाने को कहा । वहां रखे एक पलंग पर जाकर मैं लेट गया और मैंने देखा कि वह लाल साड़ी वाली महिला अपनी छोटी सी बच्ची को लेकर दूसरे कमरे में चली गई है ।

उस काली रात के घूप्प अंधेरे में घुलती हुई उस छोटे से बल्ब की रोशनी के सहारे मैं अपनी पुरानी यादों में उतर गया । 

अब से 8 साल पहले जब मैं 22  का था तब मैं अपने पास ही के एक गांव की लड़की से इश्क कर बैठा । वो इतनी सुंदर थी कि मैं जब भी उसे देखता था तो मुझे पहली बार देखने जितना ही रोमांच अनुभव होता था ।

क्योंकि हमारी जातियां अलग-अलग थी इसलिए मैंने घर से भागने का निर्णय लिया। वह भागना नहीं चाहती थी लेकिन मैंने उससे कहा कि उसे अपने परिवार और मेरे बीच किसी एक को चुनना होगा ।

और अगली रात जब सब लोग सोए थे तब चुपके से अपने परिवार को छोड़कर वह मेरे साथ भाग गई। हमने इंदौर जाकर एक मंदिर में शादी की और एक सस्ते होटल में ठहरने का निर्णय लिया ।

चूंकि मैंने अपनी प्रेमिका को कभी नहीं छुआ था इसलिए शादी के बाद मिलन की इस सुनहरी रात के लिए मैं काफी उत्साहित था लेकिन वह उतनी हीं घबराई हुई थी। परिवार को छोड़ने की उदासी उसके चेहरे पर पसरी हुई थी । उसकी आंख के आंसू टूटने का नाम भी नहीं ले रहे थे और मेरे समझाने पर वह ना चाहते हुए भी मिलन के लिए तैयार हो गई ।

मैं जितना उस सुनहरी रात को यादगार बनाना चाहता था, वह रात उससे भी ज्यादा यादगार होने के लिए  तरस रही थी। दरअसल हुआ यूं कि जब मैं उससे प्यार कर रहा था तब मैंने पाया कि कुंवारेपन के देवता का टूटा हुआ दूत अपना लाल संदेशा लेकर नहीं आया है और इसी बात पर मुझे अपनी पत्नी बन चुकी प्रेमिका की वफा पर शक हुआ। मुझे लगा कि वह मुझसे पहले किसी अन्य पुरुष के साथ अपना कौमार्य खो चुकी है ।

और इस बात पर मैं भड़क गया। मैंने उसके चरित्र पर उंगली उठाई और उसे गंदी-गंदी गालियां दी । उसने लाख कसमें खाई कि उसने मेरे सिवा कभी किसी को छुआ भी नहीं है लेकिन मैं उसकी बात मानना नहीं चाहता था क्योंकि मेरी मर्दानगी इस बात की इजाजत नहीं देती थी कि मैं किसी जूठन का उपभोग करूं ।

अंततः मैं उसे उसके गांव छोड़कर भाग गया । वो बहुत रो रही थी कि मेरे छोड़ देने के बाद लोग उसे ताने मार मार कर उसका जीना बेहाल कर देंगे। समाज तो क्या उसे उसका परिवार भी नहीं अपनाएगा लेकिन मैंने उसकी एक भी बात नहीं सुनी और उस दिन के बाद मुझे नहीं पता कि मेरी पत्नी का क्या हुआ ?

मुझे बाद में पता चला कि जब लड़कियां ज्यादा साइकिल चलाती है या खेलों में एक्टिव रहती है तो ऐसा हो सकता है कि कौमार्य टूटने का संकेत नहीं आए। मेरी पत्नी को भी साइकिल चलाने का बहुत शौक था लेकिन मैं उसे बेवफा मानना ज्यादा पसंद करूंगा क्योंकि इससे मेरे निर्णय को सही ठहराना आसान हो जाता है  और साथ ही मेरा जीना भी।

खैर, मैं नींद में डूबते उतराते हुए अपने पुराने जीवन की घटनाओं के बारे में सोच ही रहा था, तभी मुझे लगा कि कोई मेरे ऊपर बैठा हुआ है । मैंने आंखें खोली, देखा तो पाया कि वही लाल साड़ी वाली औरत मेरे ऊपर बैठी है जिसने मुझे बचाया था ।

उसने अपनी उंगलियों से मेरा चेहरा सहलाया और इसके बाद उसने अपनी अंगुलियां मेरे मुंह पर रख दी और वह अपना चेहरा मेरे चेहरे के करीब ले आई ।

और हां मैं यह बताना तो भूल ही गया कि यह लाल साड़ी वाली औरत मेरी वही बीवी है जिसे मैं 8 साल पहले छोड़कर भाग चुका था ।

उसने अपनी आंखें मेरी आंखों में गड़ा दी और जब मुझे लगा कि वह मुझे चूम कर इस काली रात को सुनहरा कर देगी तभी उसने चमकता हुआ खंजर मेरी छाती में गाड़ दिया । रक्त के फव्वारे छूट रहे थे और मेरे लाल रक्त से उसकी लाल साड़ी और ज्यादा सुर्ख हो गई थी ।   

 उसने वह खंजर निकाला और फिर कहा-
" उस दिन तेरे छोड़ने के बाद मैं पल पल कितनी मरी हूं इस बात का एहसास, एक बार मरने से नहीं होगा तुझे । अगर मेरा बस चले तो मैं तुझे बार-बार जिंदा करके मार दूं ।

और हां तुझे चमकता लाल खून बहुत पसंद है ना ?  देख तेरी छाती से कितना खून बह रहा है ! एकदम पवित्र और इतना कुंवारा जितना तूने कभी चाहा था ।"

और इसके बाद उसने वो खंजर मेरी छाती में गाड़ दिया ।

कहानी- वह आई जैसे गालों पर डिंपल आते हैं

जुलाई गिले दिनों में लिपटा था पर मेरी जिंदगी में अकेलेपन का सूरज ऐसा तप रहा था की बरसात मेरे लिए सिर्फ एक भीगा हुआ शब्द था, कोई मौसम या त्योहार नहीं ।

तभी वह आई जैसे गालों पर डिंपल आते हैं जैसे नाक की दहलीज पर नववधूओं सी सांसे आती है । 

मैं इंजीनियरिंग कॉलेज में था । हम मिलने लगे थे । पढ़ाईयों के बहानों के बीच । तकनीकी समस्याओं के सिर खपाउँ समाधानो के बीच । और जैसा कि होता है मुझे हो गया । प्यार । उसका बुखार, ऐसा चढ़ा कि वह सामने बैठी होती थी तो भी मुझे उसकी यादें आती थी । काली रातें रो-रोकर सफेद हो जाती थी । उसको देखता था तो लगता था कि जितना देखा कम देखा उसे । जितना चखा सांसों से कम चखा उसे । मुझे उसकी खूबसूरती का दरिया पीना था और कमबख्त मेरे पास आंख के एक जोड़ी प्याले थे ।

कहते हैं कि देवताओं के राजा इंद्र के पास हजारों आंखें हैं । पूरे शरीर पर फैली हुई । ताकि वह अप्सराओं की खूबसूरती को पी सकें । मुझे इंद्र होने की इच्छा होती थी वो तो अप्सरा थी ही। मुझे वह अप्सरा होने के साथ-साथ भगवान भी लगती थी । क्योंकि उम्र ऐसी थी कि स्त्री उस समय तक भगवान जैसी ही दिखती थी। अलभ्य और सुंदर । उसके इंसान होने की कल्पना को मैं सिरे से खारिज कर देता था ।

काश स्त्रियों को इंसान मान लेता । काश उनके हाड़ मांस को उसी मिट्टी का बना मान लेता जिस मिट्टी से मेरा बना है तो शायद चीजें कुछ आसान हो जाती । कुछ प्रेम कहानियां घट जाती ।  

क्योंकि दो इंसानों को प्यार करते हुए तो सब ने देखा है लेकिन एक भगवान और एक इंसान को प्यार करते हुए किसी ने नहीं देखा है सिर्फ सुना गया है और वह भी धर्म के पुराने ग्रंथों में । मैं इंसान था और वो मेरी भगवान थी । और यह प्रेम कहानी भी अधूरी ही होनी थी जैसे आगे आने वाली सारी प्रेम कहानियां अधूरी होनी ही है ।

- पंकज देवड़ा

गुड़ का गुड्डा, तिल की गुड़िया

कहानी- कत्थई चांद

वह पहली बार था जब मेरी सफेद पतंग पर बना कत्थई चाँद आसमान के मासूम गालों की मीठी मीठी किसियां लेने लगा था ।

वह पहली बार ही था जब मेरी पतंग के बाजुओं से पंख फूटे थे और वह किसी चिड़िया के नन्हे चूजे की तरह हड़बड़ाती हुई आसमानों में गोता लगाते जा रही थी । उसे देख कर मुझे इतना अच्छा लगता था जितना किसी को इश्क में अच्छा लगता है ।

वह पहली बार ही था जब मेरी पतंग में लगी बांस की दो खिपंचीयाँ एक दूसरे को गोद में भर कर शून्य में झूम रही थी ।

वह पहली बार ही था जब दिन और रात धरती के घूमने से नहीं बल्कि धागे से भरी घिरनी के अपने अक्ष पर घूमने से होने लगे थे । समय मेरी पतंग की जोत से बंधा था और मेरा मिजाज़ हवाओं के महकते दुपट्टे से ।

वो पहली बार ही था जब बारिशे आसमानों से नहीं किसी की भीगी हुई जुल्फों से हो रही थी । वो नहा कर छत पर आई थी और तौलिए से अपने बाल सुखा रही थी । जब उसके चेहरे के आसमान से जुल्फों के बादल हटे तो मैं पागल हो गया कि किसे देखूं ? एक कत्थई चांद मेरी पतंग पर और एक कत्थई चांद उसकी आंखों में तैर रहा था ।

मैंने उन सालों में पहली बार पाया कि मेरी छाती के बाएं हिस्से में एक पतंग उड़ रही है जिसका आकार पान के पत्ते की तरह है, जिस पर उमंग का एक कत्थई चांद उग आया है और उसकी जोत से बंधे हुए धागे का आखिरी सिरा मेरी उंगलियों से अभी-अभी फिसला है और बस तभी से मैं उस पतंग को पकड़ने के लिए दौड़े जा रहा हूं, दौड़े जा रहा हूं ।

- पंकज देवड़ा

रातें इतनी सर्द हुई है

रातें इतनी सर्द हुई है,
कि सांसे आती बर्फ हुई है ।

सुलगा दिए है मैंने दिन सारे,
हथेलियों में रगड़ रगड़ कर,
राख-अंगार कर दिए है कुछ तारे ।

अब तुम्हारे कंधे से फिसलती धूप का,
एक कतरा मेरी उंगलियों पर मल दो ।
तुम्हारी बाहों में जो मुलायम भेड़ें है,
उनके बीच मुझे मेमने सा रख लो l

- पंकज देवड़ा

तुम तोड़ती हो, जोड़ती हो रिवाज हूँ क्या ?

तुम तोड़ती हो, जोड़ती हो
रिवाज हूँ क्या ?

याद करते करते भूल जाती हो
इतिहास हूँ क्या ?

साथ रहती भी हो, कोसती भी
समाज हूँ क्या ?

मेरे हर कहे का, अलग मतलब निकालती हो
किसी मजहब की किताब हूँ क्या ?

- पंकज 

मेरे बेटे "बनी" के जन्मदिन पर मेरी विशेष शुभकामनाएं

मेरे बेटे "बनी" के जन्मदिन पर मेरी विशेष शुभकामनाएं -

तू खूब अच्छा इंसान बनना,
लोग तुझे प्यार से पूरा भर सके,
इसलिए खुद को खाली करने की हद तक
दूसरों पर प्यार उड़ेलना ।

बैंक बैलेंस हो, गाड़ी हो 
मन से मेल खाती लाड़ी हो ।
पर इन सबसे ज्यादा जरूरी है
तू किसी से नफरत ना पालना ।
लाख रस्ते दुनिया गढ़े तेरे लिए
तू खुद के मन का रास्ता ढालना ।

चार किताबे कम पढ़े तो चलेगा
लोगों के मन ज्यादा पढ़ना ।
खेलना, कूदना, चित्र बनाना 
चाहे कहानियां-कविता लिखना, 
अधूरा रहना, ज्यादा से ज्यादा सीखना ।

हर दिन ऐसे जीना जैसे एक नया जनम हो,
इतनी मोहब्बत करना जैसे यही तेरा धरम हो ।

-  पंकज देवड़ा

( Happy Birthday  Bunny)

तुम्हारे नाखूनों में चिपके हैं तितलियों के पंख

तुम्हारे नाखूनों में चिपके हैं
तितलियों के पंख,

तुम्हारी बाहों में दुबके हैं
खरगोश सारे मुलायम,

तुम्हारी पलकों पर झूलते हैं
चमचमाते जुगनू,

तुम्हारी नाभि में बंधा है 
कस्तूरी वाला हिरण ।

- पंकज देवड़ा

इश्क में रोज़गार

इतना बेशर्म हूं कि जहां-जहां फेकोगे वहां वहां उगूंगा मैं

इतना बेशर्म हूं कि जहां-जहां फेकोगे
वहां वहां उगूंगा मैं 

जितना धकेलोगे पीछे उतना अड़ूंगा मैं l
अपने समय का धुआं हूं, आग नहीं,
जितना फूँकोगे उतना उठूंगा मैं

तुम्हारे बगीचे का पेड़ नहीं हूं
के काट-छांट कर सजा दोगे
पुराने बरगद की तरह
अपनी ही टहनियों से फूटूंगा मैं 

मैं लाल चमकीला रक्त हूं
नसों में ना बहा
बोतलों में भी रहा
तो भी उतना ही ज़िंदा रहूंगा मैं

- पंकज देवड़ा

न्यूज़ चैनल का एंकर

उस न्यूज़ चैनल का एंकर जब,
कुत्तों की तरह चाटता था 
अपने प्रिय नेताओं के पांव l
तो उसकी जबान पर,
पड़ जाते थे, खुशामद के घाव l

जब वह उन्हीं घावों के साथ 
अपनी प्रेमिकाओं को 
चूमता था l
तो छूटता था,
उसके मुंह से फव्वाँरा, 
जनता  के लाल रक्त का l

और ढेर सारा मवाद,
होठों से लुढ़क कर 
रिसता था उनकी छातियों पर l
जो उपजा था 
उसकी डिबेट्स में
लोकतंत्र के फोड़ो को
मसल दिए जाने से l

- पंकज देवड़ा

इतना अंधेरा भर चुका था उस हृदय में

इतना अंधेरा भर चुका था उस हृदय में,
कि एक सूरज का जलकर 
खाक होना भी कम पड़ गया l

इतना सन्नाटा था वहां,
कि एक विचार,अपने आप को
सुनाने की जद्दोजेहद में मर गया l

सांसे एक दूसरे के क़त्ल में
इतनी व्यस्त थी वहां,
कि अपने आने और जाने के बीच के 
खालीपन को जीना भूल गई थी l

- पंकज देवड़ा

उनकी एड़ियों की दरारों में

उनकी एड़ियों की दरारों में,
तुम्हारे लहलहाते खेत
धस ना जाए l

छोड़ दो उनके घरों पर कब्जा, 
कहीं रूहों को बेदखल कर
वो तुम्हारे जिस्मों में बस ना जाए l

अगर तुम खुदा हो,
तो झुकाए रखो उन्हें तुम्हारे सजदे में l
कहीं उनका सिर उठाना
कोई मजहब नया बन न जाए l

- पंकज देवड़ा

उसकी उंगलियों से

उसकी उंगलियों से,
मेरी उंगलियों का 
गर्मियां चुराना जारी था l

उम्र इतनी बर्फ थी
कि कलेजा गर्म रखना भारी था l

- पंकज देवड़ा

मुझे किस्सा किस्सा कर दिया

आधा शहर बन गया हूं मैं

Wednesday, October 30, 2019

तेरी सांसो की गीली सड़क पर

तेरी सांसो की गीली सड़क पर,
हजार बार फिसला हूं मैं l

रोशनी की तो बात ही छोड़
तेरे अंधेरों के लिए भी तरसा हूं मैं l

अब बारिश बन गई है तो
तोड़ भी जा मेरी छाती l

देख यूं तिनकों की तरह,
घुटनों पर सिमटा हूं मैं l

लेख - सफाई कर्मियों के लिए

सफाई कर्मियों  को दिवाली के अगले दिन तथाकथित प्रसाद के नाम पर पकवान या पैसे मांगना बंद कर देना चाहिए क्योंकि ये एक गुलाम प्रथा का सिंबल है जिसे उन्होंने सदियों से भोगा हैl

सफाई कर्मी भाइयों और बहनों, आप लोग गुलाम नहीं है और आप जिनसे मांग रहे हो वह आपके मालिक नहीं है l आप ठीक उसी तरह सर्विस प्रोवाइडर हैं जैसे टीचर पढ़ाने की सर्विस देता है और और डॉक्टर इलाज करने की l

दलित संगठनों को चाहिए कि वह अपने लोगों को शिक्षित करें कि उच्च जातियों के लोगों के सामने हाथ ना फैलाएं l आपसे सफाई करवा कर  वह लोग आप पर कोई एहसान नहीं कर रहे हैं l

अगर आप लोग सफाई करना बंद कर दो  तो उल्टा सुंदर शहर कूड़ा घरों में तब्दील हो जाएंगे और वह लोग अपनी जातिगत श्रेष्ठता के मारे इतने लजाएंगे कि उनके हाथ से झाड़ू भी नहीं उठेगी l

ना तो आप उनसे छोटे हैं और ना ही आपका काम  उनसे किसी मायने में छोटा है l बल्कि वह गंदगी करने वाले हैं और आप उस गंदगी को साफ करने वाले हो l

वो दिवाली बनती थी

शक्करपारा होे जाने के मेरे दिनों में,
वो मीठी चाशनी बन जाती l

गुझियों के खोल में अगर मैं बदल जाता
वो खुशबूदार भरावन सी भर जाती l

मेरे रात हो जाने कि सदियों में,
वो दिवाली बनकर कर मुझे बचाए रखती थी l

इस दिवाली कुछ ज्यादा ही रोशनी रहेगी

तुम आओगी तो
आतिशबाजियां हो जाएंगी दिल में,

नहीं तो इंतजार में तुम्हारे
दिया बनाकर जलाना तो है ही इसे.

लगता है इस दिवाली कुछ ज्यादा ही रोशनी रहेगी

कहानी - गेहूं की कथा

परियों की जगह गेहूं की कथाएं सुनाएं जाने लगी थी l इंजीनियर से किसान बने उस बूढ़े को अब भी यकीन नहीं होता था कि धरती ने गेहूं की फसल उगाना बंद कर दिया है l

उसकी बूढ़ी पत्नी की हथेलियों में गेहूं की खुशबू आती थी l वह जब तक जिंदा थी, बूढ़ा उसकी हथेलियों को हर रोज सूंघता था और गेहूं के स्वाद को अपनी स्मृति में बचाए रखने की कोशिश करता था l

उसका पहला चुंबन भी उसे सिर्फ इसलिए याद नहीं आता कि वह काफी रूमानियत भरा था बल्कि इसलिए याद आता था कि वह गेहूं के खेतों में घटित हुआ था l

जब उसकी पहली प्रेमिका के आग्रह पर उसने उसे चूमा था तो उसके कानो मैं इतनी जोर से सीटी बजी थी कि उसे गेहूं के खेत में हवाओं के सर्राटा लगाकर दौड़ने की आवाज भी नहीं आई थी l

उसे अब अब लगने लग गया था कि उसकी स्मृति में प्रेमिका का चेहरा जैसे धुंधला गया है परंतु गेहूं की बालियां अभी भी उतनी ही सुनहरी और ताजी है l

बाकी लोगों की तरह उसे वैज्ञानिकों का बनाया हुआ सिंथेटिक फूड खाना पसंद नहीं था और उसे लगता था कि जैसे पिछले 37 साल से उसका पेट भरा नहीं है l

उसे लगने लग गया था कि भूख उसके पेट में एक पौधे की तरह उग रही थी जो एक दिन बड़ी होकर उसके शरीर को फाड़ डालेगी l

संस्मरण - मेरी मोहब्बत थी उनकी क्रांति थी

मैं जल्दी से किसी के प्यार में पागल हो जाना चाहता था पर यह लग्जरी मेरे पास नहीं थी  क्योंकि पहला तो यह कि मैं 21 का होते हुए भी 15 साल के बच्चों की सी मासूमियत अपने चेहरे पर लिए हुए घूम रहा था और कॉलेज में रोज-रोज यही मंत्र सिखाया जा रहा था कि लड़कियां लड़कों पर मरती है बच्चों पर नहीं l

और दूसरा यह कि मेरा पहनावा मेरा फैशन सेंस भिखारी होने की हद तक खराब था और कोई चाह कर भी मेरे प्यार में पागल नहीं हो सकता था l

इन सबके बीच,  मैं लिखने लग गया था और फिर इस लिखने ने मेरी दोस्ती दो ऐसे क्रांतिकारियों से करवाई जो 2011 कि ठंड में तत्कालीन सरकार के खिलाफ क्रांति की गर्मी पैदा कर रहे थे l मैं उनके लिए लिखने लग गया था l

और फिर तीन चार महीनों बाद मेरे एक  रिश्तेदार की शादी हुई और मैं वहां गया l मैंने पहली बार उसे देखा l वह इतनी ही सुंदर थी जितनी इस तरह की घटनाओं में किसी लड़की को सुंदर होने का हक होता है l और जैसा मैंने पहले कहा था कि प्यार में पढ़ने की मुझे जल्दी थी कि मैं बिना कुछ सोचे समझे उसके प्यार में पड़ गया l

वह मुझसे लगभग 5 साल छोटी थी l काफी क्यूट थी l मेरी जाति वाली थी इसलिए मुझे उसके प्यार में पढ़ना इतना खतरनाक नहीं लगा क्योंकि पहला तो यह कि उन दिनों ऑनर किलिंग क्या होती है यह मैं अखबारों के जरिए समझ चुका था और दूसरा यह कि मैं अपने माता-पिता को नाराज करने का रिस्क मोल नहीं ले सकता था l मध्यम वर्गीय जो ठहरा l

डर के इन सभी गणितो का ध्यान रखते हुए उसके प्यार में पढ़ना मुझे काफी मुनासिब लगा l वह सब इतना कैलकुलेटेड था कि यदि मेरी शादी उससे होती तो मैं इससे "अरेंज्ड लव मैरिज" कहता l

और फिर उसके प्यार में पढ़ते ही मेरा लिखना छूट गया l जो मैं पत्रकार बनकर दुनिया को बदलने की बड़ी-बड़ी बातें करता था, अब मैं एक बैंकर बनकर या इंजीनियर या ऐसी ही किसी प्रजाति का जंतु बनकर उसके साथ अपना परिवार बढ़ाना चाहता था l उसके प्यार में पागल होना चाहता था l मध्यमवर्गीय जो ठहरा l

इधर मेरे क्रांतिकारी दोस्त मुझे क्रांति पर लिखने के लिए फोन करते थे और मैं था कि उसके ख्यालों में खोया रहता था l मैंने लिखना बंद कर दिया था l

और फिर कुछ दिनों बाद उस लड़की के साथ प्यार का किस्सा ही खत्म हो गया l जैसे उस क्रांतिकारी की क्रांति का किस्सा वहीं कहीं खत्म हो गया था l

वह क्रांतिकारी दिल्ली में बैठकर अब भी शायद अपने पुराने दिनों को याद करता होगा पर उसे अब भी क्रांति मिलती होगी कि नहीं मुझे पता नहीं चलता l

पर मैं अब भी उस लड़की से मिलता हूं तो वह मुस्कुरा देती है l

-  पंकज देवड़ा

लघु कथा -भीड़ में इश्क

उस कमरे में जब वो लड़की उस लड़के को पिघला देने की हद तक बाहों में भर रही थी तब कुछ लोगों की भीड़ ने अचानक से दरवाजा तोड़ दिया l

उस भीड़ ने कहा कि हमारी महान संस्कृति अनाज के भूसे कि तरह इतनी कमजोर है कि दो शरीरों के मिलन की गर्मी से भभक सकती है l इसलिए उन प्रेमी जोड़ों के शरीरों को टूटना होगा l

तभी उस लड़की ने कहा कि उनके शरीर कोई मंदिर या मस्जिद नहीं है जिनको तोड़े बगैर महान धर्मों या संस्कृतियों की रक्षा हो नहीं सकती है l

भीड़ ने इस बात को अनसुना कर दिया और इसके बाद उन प्रेमियों के रक्त की ऋचाएं दीवारों पर लिख दी गई l

लड़कियों को नहीं देखने का व्रत

लड़कियों को नहीं देखने का व्रत लिया था मैंने l उन 5 सालों के दौरान मिली पांच लड़कियों के भी चेहरे याद नहीं आते l

कभी कभी तो ऐसा होता था कि कॉलेज में कोई लड़की कहती कि मैं तुम्हारे साथ स्कूल में पढ़ती थी तो लगता था कि स्कूल के दिन किसी और जन्म की बात रहे होंगे l क्योंकि मैंने 15 से 19 की उम्र के बीच साधु बनने की ठानी थी और ब्रह्मचर्य इसकी पहली शर्त था l

मैं सुंदर मोक्ष की कामना करता था पर लड़कियों की सुंदरता से डरना चाहता था l

12वीं शुरू हुई थी l मैं उज्जैन की एक प्रसिद्ध कोचिंग पर मैथ्स पढ़ने गया l छूटा हुआ कोर्स पूरा करवाने के लिए असिस्टेंट लड़कियां पास बैठकर पढ़ाती थी l

वो उनमें से एक थी l जब वो पढ़ाती थी तो सवाल तो दूर सांस लेना भी याद नहीं रहता था l और अगर गलती से कोई सांस आती भी थी तो इतनी गर्म होती थी कि ब्रह्मचर्य का व्रत पिघल जाता था ,सन्यास की इच्छा पीछे छूटती जाती थी और कभी-कभी तो एक जन्म भी कम पढ़ने लग जाता था l

पसीने ऐसे छूटते थे कि लगता था कि शिप्रा का उद्गम मेरे ही सिर से हुआ होगा l

फिर कुछ हालात बने और कोचिंग छूट गई ब्रह्मचर्य बचा रह गया l और साल भर बाद ब्रह्मचर्य और मोक्ष दोनों की इच्छा छूट गई l

मुक्ति का बंधन टूट गया था, मैं मरना और फिर जन्मना चाहता था l मैं प्यार करना चाहता था l

और अब ऐसा होता है कि मोक्ष याद नहीं आता उसकी आंखें अब भी याद आती है l

Thursday, October 10, 2019

इश्क में दाल बाटी बन जाना

तुम चाय बन जाओ यार,
मैं बिस्कुट बन जाता हूं l
अपने तमाम करकरेपन के साथ,
मैं तुममें घुल जाता हूं l

मैं बाटी हूं राख लगी,
आओ मुझे चूर दो l
घी शक्कर बनकर इतना मुझे बुर दो,
कि मैं चूरमा बन जाऊं l
कि मैं तुमसे अपने जर्रे जर्रे को तर कर जाऊं l

और क्या-क्या बने इश्क की इस रसोई में,
चलो सब छोड़ दो l
एक काम करो तुम मुझे बाहों में भरो,
और दम लगाकर तोड़ दो l

- पंकज देवड़ा

#poetry #dal #baati #love

कपड़ों की लंबाई संस्कृतियों की महानता छोटा नहीं कर सकती

प्रिय मम्मीयों और डैडीयो,
मना ली नवरात्रि ? अब अपने बेटों को भी समझा देना कि जिस तरह एक औरत की मूर्ति का सम्मान किया उसी तरह जीती-जागती का भी कर ले l

कभी किसी लड़की से बात करें तो बेशरमो की तरह उनकी छातिया देखने के बदले उनकी आंखों में देखें क्योंकि लड़कियां सिर्फ छातिया नहीं है l इंसान है, जीती -जागती, जो हंसती भी है और रोती भी l

फेसबुक और इंस्टाग्राम पर किसी अनजान लड़की से बात करें और वह यदि इंटरेस्टेड नहीं हो तो कुत्ती-कमीनी जैसी गाली देकर अपनी औकात नहीं दिखा दे क्योंकि वो "लड़की" हो ना हो लेकिन तुम जरूर इस तरह भोक कर अपना कुत्ता होना साबित कर रहे हो l

कभी कोई लड़की थोड़ा ज्यादा हंस बोल ले तो उसका कैरेक्टर सर्टिफिकेट बना कर दोस्तों के बीच जारी मत कर देना क्योंकि जैसे तुम्हारा हंसने बोलने का मन करता है वैसे ही उनका भी करता है l वे भी इंसान हैं l सिर्फ प्यार करने की मशीनें नहीं है l

कभी कोई लड़की नाभि-दर्शना, पीठ-दर्शना या पैर- दर्शना वस्त्र पहन ले तो उसे  ताड़-ताड़ कर अनकंफरटेबल मत कर देना  या उसे भारतीय संस्कृति का ज्ञान मत पिला देना l कपड़ों की लंबाई संस्कृतियों की महानता को छोटा नहीं कर सकती l

उम्मीद है कि "सुंदर सुशील गुणी बहू" पैदा करने की फैक्ट्री बना हुआ यह समाज अपने लड़कों को भी सिखाएगा की कैसे एक लड़की को सिर्फ मां, बहन, बेटी या देवी के रूप में ही नहीं देखना है बल्कि एक स्वतंत्र व्यक्तित्व के रूप में उसका और उसके विचारों का सम्मान करना है l
#women #equality #respect

जातिगत श्रेष्ठता व शाब्दिक हिंसा के दम पर अपना दबदबा बनाए रखने वाला समाज

सोनी को सुनारटा, दर्जी जात वाले को दरजेटा,  नाई को नव्वा नाम से गाली नहीं दी तो हमारे समाज में गाली देने का सुख लोगों की जिबान को नसीब नहीं होता है l

जब तक ब्राह्मणों को मांगने वालों के साथ और राजपूतों को पियक्कड़  या गरम खोपड़ी से मिलते जुलते किसी विशेषण से सम्मानित नहीं किया तो मतलब गुस्से का पूरा इज़हार नहीं हुआ l

मेरे गांव में पाटीदार और कुमावत समाज के लोगों के बीच दुश्मनी चलती रहती थी और इसी दुश्मनी को जाहिर करने के लिए कुमावत समाज के लोग पाटीदारों को कागला और पाटीदार समाज के लोग कुमावतो को टेपला नाम देकर अपनी जातिगत श्रेष्ठता प्रदर्शित करते थे l

और हां, SC  की जातियों  को हम कैसे भूल सकते हैं, जूते सिलने वालों और सफाई करने वालों की जातियां,  सदियों से अपमान सहने वालों की जातियां,   अपनी जातियों के नामों को गंदी गालियों में तब्दील होने से बचाने का संघर्ष करने वाले लोगों की जातियां l

10 -12 साल के स्कूली बच्चे जो ऊंची जाति से संबंध रखते हैं वे दलितों को चमाड़ला कहकर अपना गुस्सा दर्शाते हैं l

और ST का आदिवासी भील समाज जिसके लोगों की गरीबी का मजाक उड़ाने के लिए उनकी तुलना बंदर से की जाती है उन्हें "मामा" कहां जाता है और वह भी उन लोगों द्वारा जिनके महल उन्हीं आदिवासियों द्वारा दिए गए व्यापार से खड़े किए गए हैं l

और इससे भी ज्यादा आश्चर्यजनक तो यह जिन धर्मों में जातियों का कॉन्सेप्ट नहीं है वह भी जातियों को उतनी हि तत्परता से मानने का प्रयास करते हैं जितना हिंदू धर्म के लोग करते हैं l

जैसे एक जैन या मुस्लिम भी किसी दलित के लिए वही हेय भाव रखेगा जो एक हिंदू धर्म वाला उनके लिए रख सकता है l

इस्लाम जिसकी स्थापना समानता के आधार पर की गई थी वह भी भारत में आकर जातिगत भेदभाव से बच नहीं सका और उसमें भी उच्च कुल के मुस्लिम झाड़ू लगाने वाले या ऐसे ही किसी काम को  करने वाले मुस्लिम परिवारों को नीची निगाहों से देखते हैं l

खान, शाह, मंसूरी, मेव, हेला इस्लाम के अंदर पनपने वाली जातियों की हायरारिकी है l

दरअसल हमारा समाज एक ऐसा समाज है जो एक दूसरे को दबाना चाहता है l जातिगत श्रेष्ठता व शाब्दिक हिंसा के दम पर  अपना दबदबा बनाए रखना चाहता है l सबसे छोटी जाति का व्यक्ति भी यह सोच कर खुश है कि उससे छोटी भी कोई एक जाति है  l जिसे वह गरिया सकता है l

धन्य है भारत का जातिवाद और धन्य है यहां के लोग जिनके लिए एक जीते जागते इंसान से बढ़कर उसकी उस जाति का महत्व होता है  जो दरअसल कहीं नहीं है बस उनके दिमाग की उपज है l

गांधी से नफरत करते हो तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है

मेरे भारतवासियों अगर तुम में से अधिकतर लोग गांधी से नफरत करते हो तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है क्योंकि दरअसल देखा जाए तो तुम लोग गांधी को डिजर्व ही नहीं करते हो  l

गांधी को प्यार करने के लिए तुम्हें अहिंसक होना होगा,   माफी देने वाला होना होगा और यह करना बहुत मुश्किल है l  इसके लिए ज़मीर में बहुत ताकत लगती है l तुमसे ना हो पाएगा l

तुम्हारे लिए बहुत आसान है कि अपने धर्म को महान बताकर दूसरे के धर्म को गाली देना, तुम्हारे लिए आसान है अपनी जाति को बढ़ा बताकर, उसके इतिहास पर गर्व करके दूसरी जातियों को पैरों तले रौंद डालना l

तुम्हारे लिए आसान है अपने देश को बड़ा बताकर के दूसरे देश को गाली देना और तुम्हारे लिए उतना ही मुश्किल है किसी की गलती को क्षमा कर देना किसी की असहमति को सम्मान  दे देना l

तुम लोग जाओ और जाकर लड़ो मोहर्रम और गणपति विसर्जन में, जाओ और लड़कियों का पीछा करो नवरात्रों में और उनके  कपड़ों  और शरीरों पर भद्दे कमेंट करो और उनको समझाइश दो कि उनकी चमकती हुई पीठ  महान भारतीय संस्कृति की आंखें फोड़ सकती हैं l

जाओ और जाकर टिक टॉक वीडियो बनाओ और वर्चुअली पॉपुलर होने के चक्कर में  रियलिटी से भाग जाओ, जाओ और जाकर किसी नेता के तलवे चाटो उसके नाम की माला जपो तबकी जब वो घुन की तरह तुम्हारा भविष्य खाए जा रहा हो l

जाओ और जाकर गाय के नाम पर इंसानों को मार डालो l जाओ और जाकर किसी को जात के नाम पर गाली दो l जाओ और जाकर  गोडसे जैसे  आतंकवादियों को महिमामंडित करो क्योंकि तुम्हें यही करना है, तुम्हें यही करना सिखाया गया है और तुम्हारा यही करना धर्म और राजनीति के उन ठेकेदारों के लिए फायदेमंद है जो तुम्हारा इस्तेमाल करना चाहते हैं l

तुमसे ना बोला जाएगा सच l तुमसे नहीं पाली जाएगी अहिंसा l तुम लड़ो क्योंकि तुम्हारे पूर्वज लड़ते थे l तुम लड़ो क्योंकि तुम्हारे आस-पास वाले लड़ते हैं l तुम लड़ो  क्योंकि  तुम्हारा जमीर तुमसे लड़ता है, तुम माफ नहीं कर सकते हो l तुम अहिंसक नहीं बन सकते हो और इसीलिए तुम गांधी को प्यार भी नहीं कर सकते हो l

(गांधी से असहमत हुआ जा सकता है परंतु नफरत नहीं की जा सकती है )

संस्मरण - कब तक भागोगे पंकज ?

मैं भगोड़ा था, परिस्थितियों से डरकर भागना मुझे बहुत अच्छा लगता था. 16 की उम्र में एक दिन मैं घर छोड़कर भाग गया क्योंकि मैं मोक्ष पाना चाहता था l साधु बन जाना चाहता था l

27 की उम्र तक लगभग में 10 कंपनियां छोड़कर भाग चुका था l

इसी बीच कुछ रिश्तो के बंधन थे जिनको मैं तोड़कर भाग जाना चाहता था l

एक कंपनी में जब उसके मालिक से लड़ कर भाग रहा था तब मेरे दोस्त ने मुझसे कहा था -"कब तक भागोगे पंकज ?"

उसका यह सवाल जैसे दिन-रात मेरा पीछा करता रहता था मैं जब भी कुछ छोड़कर भागता था मेरे दिमाग में उसका यह सवाल टेप रिकॉर्डर की तरह बजता रहता था l

2016 में, मैं मुंबई भाग चुका था ताकि फिल्में बना सकूं l लेकिन मुंबई पहुंचते ही एक कमरे की पिछली खिड़की से मैं लोगों को आते जाते देख रहा था और सोच रहा था क्या यही वो पल है जिसके लिए मैं सब कुछ छोड़ कर भागना चाहता था और इसका जवाब "ना"आया और उसी पल में मुंबई छोड़कर भाग आया.

मैं अपने भगोड़ेपन से परेशान हो चुका था, मेरा डिप्रेशन सुसाइडल होने की हद तक बढ़ चुका था मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मैं अपनी मुसीबतों से कैसे भाग जाऊं ?

न दिल्ली में मुझे मोक्ष मिलता था ना मुंबई में मुझे सुकून  , ना अध्यात्म मुझे जीवन कि संपूर्णता दे पा रहा था और ना ही फिल्म मेकिंग जिंदगी जीने का लक्ष्य l

क्या है वो जो मुझे शांति दे दे ? क्या है वो जो मुझे अपने आप से मुक्ति दे दे? मेरी चिंताओं से, मेरी समस्याओं से पीछा छुड़ा दे ? तभी एक जादू हुआ जिसने मेरी पूरी जिंदगी बदल दी l

वह जादू यह था कि मैंने अपने आप को स्वीकार कर लिया था अपनी संपूर्ण कमियों और खामियों के साथ, अपनी वीभत्सताओ के साथ l मैंने अपनी गलतियां own की क्योंकि उसके लिए मैं किसी और को दोष नहीं दे सकता l

हां मैं भगोड़ा था क्योंकि मैं सुख की तलाश में भटकता था, मैं मोक्ष पाना चाहता था क्योंकि मैं अमर होना चाहता था, मैं फिल्में बनाना चाहता था क्योंकि मैं प्रसिद्ध होना चाहता था l

एक इंसान होने के नाते चाहना गलत नहीं है,  उसके लिए कोशिश करना गलत नहीं है, कोशिश करते हुए असफल हो जाना गलत नहीं है, डरना गलत नहीं है, भाग जाना गलत नहीं है l

मैंने खुद को माफी दे दी और उसी दिन मैं मुक्त हो गया l

लड़कियों तुम बहुत पागल हो!

लड़कियों तुम तो सच में बहुत पागल हो कि रेप जैसी छोटी सी बात के लिए इतना हल्ला मचाती हो l

क्यों बोला तुमने कि स्वामी चिन्मयानंद ने मेरे साथ रेप किया, नहीं बोलना था तुम्हें क्योंकि स्वामी चिन्मयानंद हिंदू धर्म के गुरु है l क्या हुआ यदि उन्होंने  हर सुबह के 6:00 बजे तुमसे मसाज करवाना और दोपहर के 2:30 बजे तुम्हारा बलात्कार करना चाहा l

तुम्हें चुप रहना था क्योंकि वह स्वामी है उनकी सेवा करना धर्म की सेवा करना है उनकी सेवा में तुम अपना शरीर भी समर्पित कर दो फिर भले ही वह तुम्हारे शरीर को गिद्द की तरह नोच कर खा जाएं l

क्यों तुमने स्वामी चिन्मयानंद पर रेप के आरोप लगाए जबकि वह तो इस देश की सबसे बड़ी राष्ट्रवादी पार्टी बीजेपी के मंत्री हैं l पूरी दुनिया गलत हो सकती है पर बीजेपी कभी गलत नहीं हो सकती l वह हमेशा देश का भला चाहती है और इस देश के भले के ढोंग में अगर तुम जैसी दो-चार लड़कियां अपना शरीर हवस की आग में आहूत कर दे तो इसमें बुरा ही क्या है l

देखो इसके मुखिया मोदी जी 18 घंटे काम करते हैं उनके चमचे दिन रात उनको बचाने में अपनी उर्जा नष्ट करते हैं और ऐसे में यदि कोई चमचा या मंत्री या जानवर तुमसे बलात्कार करना चाहे तो तुम्हें इसमें आपत्ति नहीं लेनी चाहिए l

लड़कियों सच में तुम बहुत पागल हो कि इस खूंखार वक्त में तुम स्वामी चिन्मयानंद जैसे धर्म के ठेकेदार राजनीतिज्ञों से लोहा ले रही हो क्योंकि अंत में विजय उन्हीं की होगी जिनके हाथ में सत्ता है l तुम्हारे हाथ तो सिर्फ आंसू ही आएंगे l तुम रो लो जी भर के क्योंकि न्याय सिर्फ कविताओं में बचा हुआ है l

एक बोली है मालवी

एक बोली है मालवी,
जब रोती है तो उसकी आंखों से
टपकते हैं खून से सने शब्द l

क्योंकि उसके अपने ही लोग,
उसे चुप करा कर,
गाड़ देना चाहते हैं अपने ही आंगन में,
ताकि बोया जा सके एक पौधा
जो उगाए एबीसीडी और "अनाराम"

जैसे बची रहती है कोई विधवा मां,
अपने बच्चों के बीच,
ठीक वैसी ही बची हुई है वह,
उन लोगों के बीच,
जो माने जाते हैं सृष्टि से भी पुराने,
और जब वह रोते हैं इस बोली में,
तो दुनिया हंसती है उनके आंसुओं पर,
उन्हें गवार कहकर l

एक बोली है मालवी,
जो उगती है कपास के फूलों में,
जात्राओं और हाटो के झूलों में l
जो खाती है कुल्फी,
लड़ाती है इश्क l
गाती है संजा,
और फिर मार दी जाती है,
अपने ही कुलों में l

- पंकज देवड़ा

मैं पत्रकार लिखूंगा तुम रवीश कुमार समझ लेना

...और जब कि इस मायावी वक्त में  जब न्यूज़ चैनलों पर सरकार के तलवे चाटने वाले दलालों का दबदबा है जो अपनी वफादारी से कुत्तों को भी मात दे दे l

और जो अपने गलों में एक अदृश्य पट्टा डाले हुए दिन रात कुछ इस तरह भोंकते हैं कि उनकी हर भोक में एक  नेता महान की चरण वंदना सुनाई देती है l

जिनकी गले से निकलती हुई हर चीख का सिर्फ एक ही मकसद होता है कि सरकार के खिलाफ उठने वाली आवाजों का दमन किया जा सके l

जिन्होंने राष्ट्रवाद के नाम पर हिंदुस्तान की रगों में हिंदू मुस्लिम का ऐसा तेजाब फैला दिया है कि इसकी आवाम हर बढ़ते दिन के साथ और भी ज्यादा खूंखार हिंसक कट्टर और एक दूसरे की खून की प्यासी होती जाती है l

ऐसे खूनी असहिष्णु और हिंसक समय में इस अहंकारी सत्ता से हर पल लोहा लेने वाला इसकी आंखों में आंखें डाल कर इसकी गलती बताने वाला एक ऐसा पत्रकार भी मौजूद है जिसने अभी तक भारतीय पत्रकारिता स्तर नीचे गिरने से बचाए रखा है l

ऐसे महान पत्रकार रवीश कुमार को लोकतंत्र की आवाज बनने के लिए रमन मैग्सेसे पुरस्कार दिया जाना एक भारतीय होने के नाते बड़े गर्व का विषय है आदरणीय रवीश कुमार जी को बहुत-बहुत बधाई l

Sunday, June 22, 2014

पवित्र चुम्बन

मैं तुम्हे चूमुंगा उतना,
जितना भूख चूमती आँतों को,
आँसू आँख के कोनों को,
और प्यासें पानी को,
तुम्हारे होठों पर उकेरे गए,
सारे अनकहें शब्द, लज्जाएँ,
पवित्र भ्रूण सा अधुरा इश्क़,
दुःख-दर्द और कलाएँ,
मैं समेट लूँगा अपने चुम्बन की
लिजलिजी रूहों में |
और मेरा यकीन मानो मेरी जान,
किसी को भी मुक्त करने की हद तक चूमने के लिए,
नहीं लगता कोई क्रेश-कोर्स,
न ही कोई 101 तरीक़ों वाली किताब,
न हीं कोई समीकरण,
बस चाहिए तो दों होठों के जोड़ें,
जिन पर लीप दी गयी हो नमी,
और भुरभुरा दिए हो प्रेम बीज,
और जब मैं तुम्हारे ऊपर और निचे वाले होठ को
बारी-बारी से चूम रहा होऊंगा,
तो उन्हीं नितांत निजी और तथाकथित अश्लील पलों में,
मैं अपने सारे दुखों से मुक्त हो रहा होऊंगा |

Saturday, May 24, 2014

कहानी- एक लड़की चाँदबाज़...

अनुराग कश्यप के सिनेमेटिकल मास्टरपीस DEV. D का एक दृश्य




एक जोरदार उल्टी करने की नाकाम कोशिश करने के बाद, मैं बाथरूम में ही बैठ गया और तभी मुझे लगा कि जैसे किसी ने मेरे बाएं कान पर चाकू चला दिया हो | मैनें अधखुली आँखों से बायीं और देखा वो चाकू नहीं... नल से टपकी हुई पानी की बूँद थी, जो अभी भी मेरे कान से होती हुई निचे रिस रही थी और जबकि मुझे ये पता चल गया था कि ये पानी की बूँद ही थी, तब भी उसका रिसना मुझे चाकू से खरोंचने जितना ही दर्द भरा लग रहा था | क्योकि यह दिसंबर की कड़कड़ाती ठण्ड का मौसम था |

मैं इतना ज्यादा ठिठुर रहा था कि मुझे लगा जैसे मेरे फेफड़ों की सारी हड्डियाँ लगातार हिलने की वजह से एक-एक करके टूट रही हैं, और मेरा दिल कभी भी फेफड़ों से टूट कर खाली पेट के किसी कोने में पड़ा पड़ा धड़क रहा होगा |

मैं जोर-जोर से साँसे ले रहा था, हर आती हुई सांस के साथ मेरा नाक छिलता जा रहा था | तभी मैं बूँद –बूँद टपकते उसी नल को पकड़ कर उठ गया और जबकि मुझे किराये के उस कमरे का दरवाज़ा खोल कर डॉक्टर के पास चले जाना चाहिए, मैं सीड़ियों पर चढ़ता हुआ छत पर चल गया और वहाँ पड़े एक टूटे हुए पलंग पर लेट गया और अगर आप इस “लेट” गया को गिर गया समझेंगे तो ज्यादा मेहरबानी होगी |

दोपहर की उस धुप में औंधे मुँह लेटने का...नहीं, पड़ जाने का जो सुख है, वो 4 महीने पहले कॉलेज ख़त्म करके अपने दोस्तों के साथ गोवा में मस्ती करते हुए उन गौरी लड़कियों को धुप सेंकते हुए देखने से ज्यादा वाला सूख था | मैं तीन रातों से लगातार सोया नहीं हूँ इसलिए मुझे लग रहा है की जैसे मेरे सिर का पिछला हिस्सा दर्द के मारे थोड़ी देर में ही फट जाएगा और हो सकता हैं कि सिर का फटना भी दिपावली पर “बन्दर छाप”  सूतली बम फटने की तरह आवाज़ करता हो |

और हो सकता है कि इस आवाज़ को सुनकर पास वाली छत पर पतंग उड़ाने की नाकाम कोशिश करता हुआ एक बच्चा और उससे थोड़ी दूर पानी की टंकी पर बैठी हुई वो लड़की मेरी और देखने लग जाएँ | और मुझे ये समझ नहीं आ रहा है कि उस बच्चे के हाथ में ठिठुरती हुई वो पतंग चान्दबाज़ (ऐसी पतंग जिस पर गोल चाँद बना हो ) होने की वजह से खुबसूरत लग रही है या वो लड़की खुबसूरत होने की वजह से चान्दबाज़ लग रही है |

वो लड़की किताब हाथ में लेकर किसी दूसरी छत की और देख रही है | एक जोरदार आवाज़ आई तभी किताब में मुँह धसाई उस लड़की ने पीछे पलट कर मेरी और देखा | और मुझे लगा कि सच में मेरा सिर फट गया होगा और तभी मेने अपना सिर सम्भाला, वो फटा नहीं था | आवाज़ पलंग के टूटने और मेरे ज़मीन पर गिरने की थी | मैनें गिर जाने के बाद अपना सिर संभालने के अलावा और कोई प्रयास नहीं किया जो की यदि में बीमार नहीं होता और ऐसे ही किसी पलंग से गिर गया होता और यदि ऐसी ही कोई लड़की मेरी और देख रही होती तो अब तक मैं फर्स्ट इम्प्रैशन खराब होने के गम में दस बार सिर ठोंक चूका होता |

वो लड़की उसकी छत और मेरे मकान मालिक की छत को जोड़ने वाली दिवार के पास आकर खड़ी हो गई | अब आप ये न सोचे की मैं उसकी खुबसूरती के कसीदे पढ़ने लग जाऊंगा कि वो व्हाईट सलवार और ब्लू टी-शर्ट में बहुत खुबसूरत लग रही है की उसने अपने हाथो में वैसे ही शेड्स वाली नेल-पोलिश लगा रखी है जैसी मेरे कॉलेज में मेरे साथ पड़ने वाली एक लड़की ने लगा रखी थी और जबकि नेल पोलिश को सिर्फ देखना होता है मैनें उसकी उँगलियों को हाथों में लेकर नेल पोलिश को छुआ और महसुस किया था उसकी उँगलियाँ कपास के फूल पर लगी हुयी रूई की तरह इतनी तो सफ़ेद थी की जब मैनें उन्हें छूकर छोड़ा तो वो लाल हो गई |   

खैर... मैं यह कह रहा था कि मैं इस छत वाली लड़की की खुबसूरती बयान करने में जरा सा भी टाइम वेस्ट नहीं करूँगा | बस इतना समझ लीजिये की वो इतनी ही खुबसूरत थी जितना इस तरह की किसी घटना में किसी अकेली लड़की को खुबसूरत होना चाहिए या होने का हक़ होता है |
उसने मुझसे कहा कि “क्या हुआ तुम्हें ?” और उसके सुर्ख होठों से निकले इस खुबसूरत सवाल का कोई बीमारों वाला जवाब देना था या उसे बता देना था कि मैं पिछली तीन रातों से सोया नहीं हूँ, और इसकी वजह कोई टिपिकल प्रेमिका नहीं है कि जिसके साथ रोज रात को 12 से 6 तक ऐसी बातें करना जरुरी हो कि जिनमें गली के आवारा कुत्तों से लेकर सलमान के कुँवारे जुत्तों तक का सारा ब्यौरा उपलब्ध हो |

बल्कि इसकी वजह ये है कि मुझे सॉफ्टवेर इंजीनियरिंग की जॉब में ख़ुशी नहीं मिल पा रही है | भले ही कुछ हज़ार की गड्डियों से खुबसूरत कारें, फ्लेट्स और उतनी ही खुबसूरत बीवियों को पा लेने (या चाहे तो खरीद लेने) की औकात आ जाये पर अपने काम के साथ मिलने वाली संतुष्टियों को पाने में नाकामी हाथ आ रही है | मुझे फ़िल्में बनानी है पर यहाँ मजबूरन पैसे कमाने के लिए मैं झक्ख मार रहा हूँ | और इसी टेंशन की वजह से बीमार हो गया हूँ |

खैर... उसके “क्या हुआ तुम्हें” पूंछने के बाद मैंने कोई जवाब नहीं दिया और बेहोश हो गया | और जब आप ये समझ रहे होंगे कि छत पर मेरी आँखें बंद होने के बाद सीधे हॉस्पिटल में खुलेंगी और वो लड़की रात भर मेरी केयर करते हुए मेरे सिरहाने के पास रखी हुई कुर्सी पर बैठी-बैठी सो चुकी होगी तो ये बता देना मेरा फ़र्ज़ है की मैं अस्पताल में सारी रात अकेला ही था l